6 सितंबर 2010

०३. मेघ बजै, हवा चलै : धर्मेन्द्र कुमार सिंह "सज्जन"

मेघ बजै, हवा चलै
जियरा अगियार जलै

धनुष-गगन, बूँद-तीर
मन्मथ तन रहा चीर
मन होवै अति अधीर
पोर-पोर बढ़ै पीर
सन-सन पछियाँव बहै
बिरही मन आज दहै
सूरज ज्यों गले मिलै

अमवा झुकि झूमि-झूमि
महुआ मुख रहा चूमि
भीग रहे पात-पात
पुलकित हैं उभय गात
झर-झर-झर प्रेम झरै
चरर-मरर जिया करै
देखि-देखि बाँस जरै
--
धर्मेन्द्र कुमार सिंह "सज्जन"

8 टिप्‍पणियां:

  1. डा सुभाष राय7 सितंबर 2010 को 9:26 am

    धर्मेन्द्र का विरही मन बहुत सुन्दरता के साथ सामने आया है. अच्छे गीत के लिये बधाई

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  2. अमवा झुकि झूमि-झूमि
    महुआ मुख रहा चूमि
    भीग रहे पात-पात
    पुलकित हैं उभय गात
    झर-झर-झर प्रेम झरै
    चरर-मरर जिया करै
    देखि-देखि बाँस जरै
    -- dhvani shbdon ne man moh liya
    saader
    rachana

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  3. अमवा झुकि झूमि-झूमि
    महुआ मुख रहा चूमि
    भीग रहे पात-पात
    पुलकित हैं उभय गात
    झर-झर-झर प्रेम झरै
    चरर-मरर जिया करै
    देखि-देखि बाँस जरै
    -- वाह वाह वाह । कितना प्यारा है यह शब्दों का सोता ।

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  4. purbi hindi ki sugandh liye geet me antim para achchha laga sadhuvaad

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  5. नवगीत की नई परिभाश्आ रचता हुआ मन कानन को
    झुमाता हुआ बिल्कुल अनूठे अंदाज के चिर पचिरिाचि
    रचनाकार भाई धर्मेन्द्रजी को हार्दिक बधाई

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  6. सरस सहज प्रवाहपूर्ण रम्य रचना. साधुवाद.

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