6 अक्तूबर 2010

१९. मेघ बजे रे : संजीव सलिल

मेघ बजे, मेघ बजे
मेघ बजे रे
धरती की आँखों में
स्वप्न सजे रे

सोई थी सलिला
अंगड़ाई ले जगी
दादुर की टेर सुनी
प्रीत में पगी
मन-मयूर नाचता
न वर्जना सुने
मुरझाये पत्तों को
मिली ज़िंदगी
झूम-झूम झर झरने
करें मजे रे
धरती की आँखों में
स्वप्न सजे रे

कागज़ की नौका
पतवार बिन बही
पनघट-खलिहानों की
कथा अनकही
नुक्कड़, अमराई
खेत, चौपालें तर
बरखा से विरह-अगन
तपन मिट रही
सजनी पथ हेर-हेर
धीर तजे रे
धरती की आँखों में
स्वप्न सजे रे

मेंहदी उपवास रखे
तीजा का मौन
सातें-संतान व्रत
बिसरे माँ कौन
छत्ता-बरसाती से
मिल रहा गले
सीतता रसोई में
शक्कर संग नौन
खों-खों कर बऊ-दद्दा
राम भजे रे
धरती की आँखों में
स्वप्न सजे रे
--
संजीव सलिल

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपके भाव सरोवर में पुनः अवगाहन करते हुए अपार हर्ष की अनुभूति हो रहीं है आपके ही “शब्दो मे यदि यह कहे कि

    कागज़ की नौका
    पतवार बिन बही
    पनघट-खलिहानों की
    कथा अनकही
    नुक्कड़, अमराई
    खेत, चौपालें तर
    बरखा से विरह-अगन
    तपन मिट रही
    सजनी पथ हेर-हेर
    धीर तजे रे
    धरती की आँखों में
    स्वप्न सजे रे

    तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

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  2. सलिल जी की कलम से एक और शानदार नवगीत। बधाई।

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  3. सज्जन-मंडल का हुआ, सलिल-ह्रदय पर राज.
    मेघ बजे हैं जोर से, क्या जाने किस व्याज??

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