7 अक्तूबर 2010

२०. इतना मत तरसा :

इतना मत तरसा
यार, कुछ बूंदें तो बरसा

इतनी गरमी हाय पसीना
दिन बदरंग हो गया कारी
टेर रहा है मोर और
लगी सूखने है फुलवारी
कुछ भीगेंगे कुछ नाचेंगे
कहरवा, कजरी को हरसा

दृष्टि जहाँ तक सृष्टि हँसेगी
डाल-डाल पर झूले
दिन की बारहमासी
रातोंरात मल्हारें छूले
मत टँग आसमान में मैले
झर तू झर-झर-सा

धूल बनोगे या एक मोती
या वारिधि का संग
सब कुछ भला-भला-सा होगा
आओ, जैसे गंग
घर से निकले हो तो
मन में ऐसा क्यों डर-सा
--
क्षेत्रपाल शर्मा
(नई दिल्ली)

2 टिप्‍पणियां:

  1. इतना मत तरसा
    यार, कुछ बूंदें तो बरसा

    नवगीत के इस सत्र में अवर्षा की व्यथा-कथा अब तक अनचीन्ही थी आपने उसे उद्घाटित किया. वर्षा स्वागत तथा अति वर्षा के साथ इसे भी प्रतिष्ठित करने हेतु धन्यवाद. अच्छा नवगीत.

    उत्तर देंहटाएं
  2. महोदय बहुत धन्यवाद . देर जो हुई उसके लिए माफ़ कर दें
    आपका क्षेत्रपाल शर्मा

    उत्तर देंहटाएं

आपकी टिप्पणियों का हार्दिक स्वागत है। कृपया देवनागरी लिपि का ही प्रयोग करें।