7 नवंबर 2010

११. मन रे, तू खुलकर सच बोल

इस झूठी
नीरस दुनिया में
कुछ सच का रस घोल
मन रे
तू खुलकर सच बोल

तू हारा
मानव हारा है
तू जीता तो यह जीता है
तेरे दम से
जीवन का हर
विष अमृत करके पीता है
तू चाहे
इतिहास बदल दे
तू चाहे भूगोल

मन में हो
यदि महक सत्य की
तन भी खिला-खिला रहता है
जीवन के
हर रंग-ढंग में
खुलकर घुला-मिला रहता है
ऐसी मीठी
महक दसों दिसि
के समीर में घोल
--
डॉ. त्रिमोहन तरल

4 टिप्‍पणियां:

  1. विषय पर केन्द्रित उत्तम नवगीत. बधाई.

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  2. इस झूठी
    नीरस दुनिया में
    कुछ सच का रस घोल
    मन रे
    तू खुलकर सच बोल
    waah!
    atyant sundar!!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. मन में हो
    यदि महक सत्य की
    तन भी खिला-खिला रहता है
    जीवन के
    हर रंग-ढंग में
    खुलकर घुला-मिला रहता है
    ऐसी मीठी
    महक दसों दिसि
    के समीर में घोल
    --
    ati sunder
    badhai
    rachana

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