8 जून 2011

६. रंग टेसू ने उड़ाए फाग के

सज गई हैं फिर
बहारें आम पर
लौट सूरज आ गया है
काम पर
फूल कर सरसों
बहुत इतरा गई
डालियाँ कचनार की
गदरा गई
झुरमुटों में कुहकतीं शहनाइयाँ।

चमक लौटी है
सुबह के भाल पर
किरन गुदने लिख रही हैं
गाल पर
रंग टेसू ने उड़ाए
फाग के
दिन बसंती
प्यार के अनुराग के
सिर चढ़ी सी हो गईं पुरवाइयाँ।

फागुनी दिन,
औऱ, महुआ पी गए
फाग-मस्ती-रूप के-
ठनगन नए
पाँव भारी
और
भरते रस कलश
खेत में सोना झरेगा
इस बरस
सपन लेते आँख में अंगडाइयाँ

-यतीन्द्रनाथ राही

4 टिप्‍पणियां:

  1. प्रकृति के बहुत सुंदर वर्णन के साथ
    आशाओं का संचार करता एक मनोहारी नवगीत!

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  2. बहुत सुंदर नवगीत, बहुत बहुत बधाई राही जी को।

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  3. यतीन्द्र राही का यह नवगीत कई जगह भावों की अतल गहराइयाँ समाहित किये हुये है जो वरबस ही पाठक को नवगीत पढ़ते पढ़ते कहीं और ले जाता है -

    " किरन गुदने लिख रही हैं
    गाल पर "
    ग्रीष्म में किरनों का ताप कितना कष्टदायक होता है यह कोई भुक्तभोगी ही जान सकता है इस अनुभूति को गोदने (गुदने) गुदाने के समय होने वाले कष्ट के माध्यम से नवगीत में प्रस्तुत करने सें जहाँ एक ओर लोकजीवन की सहज उपस्थिति है वहीं किरन का मानवीकरण करके नवगीतकार ने एक बड़ी बात कह दी है। यतीन्द्र राही जी को बहुत बहुत वधाई।

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  4. बहारें आम पर
    लौट सूरज आ गया है
    काम पर
    फूल कर सरसों
    बहुत इतरा गई
    डालियाँ कचनार की
    गदरा गई
    झुरमुटों में कुहकतीं शहनाइयाँ।
    सुंदर वर्णन सूरज भाई ठण्ड में बहुत आराम कर चुके है अब अपने पूरे ताप के साथ काम पर आये हैं सुंदर अभिव्यक्ति
    सादर
    रचना

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