15 जून 2011

१२. टेसू तुम क्यों लाल हुए


टेसू तुम क्यों लाल हुए?
फर्क न कोई तुमको पड़ता
चाहे कोई तुम्हें छुए

आह कुटी की तुम्हें लगी क्या?
उजड़े दीन-गरीब
मीरां को विष, ईसा को
इंसान चढ़ाये सलीब
आदम का आदम ही है क्यों
रहा बिगाड़ नसीब?
नहीं किसी को रोटी
कोई खाए मालपुए

खून बहाया सुर-असुरों ने
ओबामा-ओसामा ने
रिश्ते-नातों चचा-भतीजों ने
भांजों ने, मामा ने
कोशिश करी शांति की हर पल
गीतों, सा रे गा मा ने
नहीं सफलता मिली
'सलिल' पद-मद से दूर हुए

-संजीव सलिल

4 टिप्‍पणियां:

  1. आचार्य जी की कलम से निकला एक और सुंदर नवगीत, बहुत बहुत बधाई।

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  2. सलिल जी, बहुत ही बढ़िया कहा है:

    आदम का आदम ही है क्यों
    रहा बिगाड़ नसीब?
    नहीं किसी को रोटी
    कोई खाए मालपुए
    टेसू तुम क्यों लाल हुए?

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  3. आचार्य जी को प्रणाम,
    आपकी लेखनी को नमन, जिससे ऐसी रचना निकलती है.

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  4. आदम का आदम ही है क्यों
    रहा बिगाड़ नसीब?
    नहीं किसी को रोटी
    कोई खाए मालपुए
    बहुत बढ़िया
    सुंदर नवगीत
    saader
    rachana

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