7 जुलाई 2011

कार्यशाला- १७, शहर का एकांत


इस बार कार्यशाला का विषय है शहर में एकांत। शहर की भीड़भाड़ में जहाँ एक तरफ एकांत और एकांत की शांति ढूँढना कठिन है वही दूसरी और सारी भीड़ में अकेलापन भी बहुत है। इन परिस्थितियों को हमारे रचनाकार किस प्रकार अनुभव करते हैं और किस प्रकार व्यक्त करते हैं इसी बात की परीक्षा होगी कार्यशाला- १७ में। रचनाएँ २० जुलाई तक भेजी जा सकती हैं। जल्दी आने वाली रचनाओं का प्रकाशन २० जुलाई से पहले भी हो सकता है।

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर विषय चुना है. अच्छी रचनाएं आनी चाहिए.

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  2. विषय का चुनाव अच्छा है| जोरदार प्रस्तुतियाँ आने की पूरी पूरी गारंटी है|

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  3. एकांत और अकेलापन -ये विरोधी मनस्थितियाँ कई बार एक साथ उपस्थित होती हैं, विशेष रूप से जहाँ स्वयं की पहचान के खो जाने का खतरा सबसे अधिक होता है जैसे एक महानगरी के महाहाट के भीड़भाड़ भरे परिवेश में| वस्तुतः यह समस्या दोहरी है - एक ओर है स्वयं के व्यक्तित्त्व के बिला जाने का भय और दूसरी ओर है किसी नितांत अपने संगी का न होना, जो हमारे सुख-दुख का सहज साक्षी हो सके| नवगीत में इस महासंकट का ज़िक्र अलग-अलग पहलुओं से बड़े ही सशक्त रूप में हुआ है| महानगरीय जिजीविषा की एक त्रासदी यही रही है| नवगीत पाठशाला में इस विषय को एक बार फिर उठाना जहाँ एक ओर नवगीत को इन सन्दर्भों से पुनः जोड़ना है, वहीँ दूसरी ओर पहले की मनस्थितियों की पुनरावृत्ति भी है| मेरी राय में रोचक रहेगा यह सन्दर्भ|

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  4. यक़ीनन बहुत ही रोमांचक होगा यह वि‍षय। अभी तक पलाश में जो भी रचनाएँ पढ़ी हैं,उत्‍कृष्‍ट लगीं। पर एक संदेह है, वैसे रचनाकार का अपना सृजन है पर चूँकि‍ यह गीत है भले ही नवगीत पर गेय होगा ऐसा मानने को मन शंकि‍त है और नहीं भी इसलि‍ए की नवगीतों का अपना एक अंदाज होता है। जैसे फि‍ल्‍म घरौंदा का गीत ' एक अकेला इस शहर में----' आशा है अच्‍छी रचनाओं का ज़खीरा होगा यह वि‍षय, मेरी शुभकामनायें।

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