8 अगस्त 2011

४. महानगर के जंगल में

महानगर के जंगल में हम
घूम रहे होते
शायद हमने कर डाले
अनचाहे समझौते

संधिपत्र तो लिखे
प्यार की कीमत नहीं चुकी
अपने ही अधरों में बंदी
अपनी हँसी-खुशी
फूटे रिश्तों में
बैलों से जोते
महानगर के जंगल में हम
घूम रहे होते

अम्मा की रामायण-गीता
सहसा रूठ गई
हरिद्वार के गंगाजल की
शीशी फूट गई
पानी पर तिनके की नाईं
घूमे समझौते
शायद हमने कर डाले
अनचाहे समझौते

डा० अश्वघोष
(देहरादून)

10 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर नवगीत हेतु बहुत बहुत बधाई अश्वघोष जी को

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  2. उत्तम द्विवेदी8 अगस्त 2011 को 6:40 pm

    एक सुन्दर नवगीत के लिए बहुत-बहुत बधाई !

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  3. डा० अश्वघोष ऐसे नवगीतकार हैं जो पूरी तरह से नवगीत को समर्पित हैं। कई नवगीत संग्रह अश्वघोष जी के प्रकाशित हो चुके हैं। उनका यह नवगीत भी बहुत पहले प्रकाशित हो चुका है जिसकी अचछी खासी चर्चा नवगीत की दुनिया में हुई है।
    महानगरों में छीजते जा रहे सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति चिन्ता व्यक्त करना नवगीतकारों का प्रमुख विषय रहा है। इन्हीं सब सांस्कृतिक मूल्यों के ह्रास होने की पीड़ा प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति ढोने के लिये विवश है।
    " अम्मा की रामायण-गीता
    सहसा रूठ गई
    हरिद्वार के गंगाजल की
    शीशी फूट गई.... "

    नवगीत की पाठशाला में डा० अश्वघोष का यह नवगीत पहली बार प्रकाशित हो रहा है, यह पाठशाला के लिये और नवगीत प्रेमियों के लिये खुशी की बात है। कई वरिष्ठ नवगीतकार पाठशाला से जुड़कर अपने नवगीत भेज रहे हैं और नवगीतों पर टिप्पणियाँ भी लिख रहे हैं यह उनके बड़प्पन का ही परिचायक है।
    बहुत सुन्दर और प्रभावशाली नवगीत के लिये डा० अश्वघोष जी को वधाई।

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  4. बहुत प्यारा नवगीत है, लगता ही कि हमारे मन की बात को ही यहाँ नवगीत में कह दिया गया है।

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  5. डा० अश्वघोष का नवगीत महानगरीय जीवन के प्रति सम्मोहन और उसके अन्तस में उपज रहे संपीड़न की त्रासदी को चित्रित कर रहा है। महानगर में रहने के कुछ लाभ भी हमने उठाये हैं तो बहुत कुछ खोया भी है। बहुत अच्छी तरह से इस पीड़ा को समझा गया है और नवगीत में प्रस्तुत किया गया है।

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  6. बहुत अच्छा नवगीत है। गंगाजल की शीशी का फूट जाना कोई साधारण क्षति नहीं है, हमारे पुरखों की सहेजी संस्कृति और सभ्यता के छीजने की गहन पीड़ नवगीत में उतर आई है। डा० अश्वघोष को वधाई।

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  7. अम्मा की रामायण-गीता
    सहसा रूठ गई
    हरिद्वार के गंगाजल की
    शीशी फूट गई
    ................... समय और संस्कृति के हास की पीड़ा के स्वर....सुंदर नवगीत के लियें बधाई मेरी डॉ अश्वघोष जी को..

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  8. अम्मा की रामायण-गीता
    सहसा रूठ गई
    हरिद्वार के गंगाजल की
    शीशी फूट गई
    ................... समय और संस्कृति के हास की पीड़ा के स्वर....सुंदर नवगीत के लियें बधाई मेरी डॉ अश्वघोष जी को..

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  9. अश्वघोष जी का यह गीत मानवीय संवेदनाओं और परंपराओं पर शहरी मार को गहरी आत्मीयता के साथ व्यक्त करता है।

    संधिपत्र तो लिखे
    प्यार की कीमत नहीं चुकी
    अपने ही अधरों में बंदी
    अपनी हँसी-खुशी
    सफलताओं की दौड़ में फँसे जीवन की मजबूरियों को ये पंक्तियाँ बड़ी ही सहजता और निष्कपटता से कह गई हैं।

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  10. अश्वघोष जी को बहुत बहुत बधाईइस मार्गदर्शक नवगीत के लिए

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