5 अगस्त 2011

३. शहर के एकांत में

शहर के
एकांत में
हमको सभी छलते
ढूँढने पर
भी यहाँ
परिचित नहीं मिलते

बाँसुरी के
स्वर कहीं
वन- प्रान्त में खोए
माँ तुम्हीं को
याद कर हम
देर तक रोए
धूप में
हम बर्फ़ के
मानिन्द हैं गलते

रेलगाड़ी
शोरगुल
सिगरेट के धूँए
प्यास अपनी
ओढ़कर
बैठे सभी कूँए
यहाँ
टहनी पर कँटीले
फूल हैं खिलते 

गाँव से
लेकर चले जो
गुम हुए सपने
गाँठ में
दम हो तभी
ये शहर हैं अपने
यहाँ
साँचे में सभी
बाज़ार के ढलते

भीड़ में
यह शहर
पाकेटमार जैसा है
यहाँ पर
मेहमान
सिर के भार जैसा है
भीड़ में
तनहा हमेशा
हम सभी चलते

-जयकृष्ण राय तुषार
(इलाहाबाद)

10 टिप्‍पणियां:

  1. वाह...वाह...
    तुषार जी, सुबह - सुबह आपका सुंदर नवगीत पढ़ने के लियें मिला
    आनंद आ गया...

    एकाकी होने की पीढ़ा से मन क्लांत हुआ....
    बधाई आपको..


    सस्नेह
    गीता पंडित

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  2. भाई जयकृष्ण राय तुषार का यह गीत आधुनिक भावबोध की सशक्त बानगी देता है| शहर की भीड़ में एक संवेदनशील व्यक्ति जो अकेलापन भोगने को अभिशप्त है, बड़े ही सटीक बिम्बों में इस गीत में उसका आकलन हुआ है| साधुवाद उन्हें इस श्रेष्ठ गीत के लिए एवं 'नवगीत पाठशाला' को इस रचना की प्रस्तुति के लिए!
    कुमार रवीन्द्र

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  3. तुषार जी के गीतों के बारे में क्या कहा जाये, बस यही कहूँगा कि आम आदमी से जुड़ी बातों को ब-क़लम करने में माहिर हैं आप।

    महानगरीय जीवन का बड़ा ही जीवंत खाका खींचा है प्रस्तुत नवगीत में। दिल से बधाई स्वीकार करें|

    एक शंका - नवगीत में चलते और मिलते के तुकांत स्वीकार्य हैं क्या ?

    एक ध्यानाकर्षण - यदि इस तरह के तुकांत मान्य हों तो इस पंक्ति में

    टहनी पर कँटीले
    फूल खिलते हैं

    -हैं- को खिलते से पहले टाइप होना चाहिए

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  4. जयकृष्ण राय जी के नवगीत तो हमेशा ही शानदार होते हैं। बहुत बहुत बधाई उन्हें इस सुंदर नवगीत के लिए।

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  5. यहाँ
    साँचे में सभी
    बाज़ार के ढलते

    कटु सचाई... सामयिक यथार्थपरक नवगीत हेतु आपको बधाई तुषार जी.

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  6. भीड़ में
    यह शहर
    पाकेटमार जैसा है
    यहाँ पर
    मेहमान
    सिर के भार जैसा है
    भीड़ में
    तनहा हमेशा
    हम सभी चलते


    वाह,
    घर से दूर रहने की मजबूरी और अकेलेपन को आपने जिस सुंदर और मार्मिक ढंग से चित्रित किया है उसकी जितनी तारीफ़ की जाए कम है
    अब मुलाक़ात अतिआवश्यक हो गई है :)

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  7. जयकृष्ण राय तुषार जी का नवगीत पाठक से सीधे बात करता है वह भी बहुत सरल और व्यावहारिक भाषा में, यही इस नवगीत की विशेषता है और नवगीत की अपनी पहचान भी यही है कि वह पूरी तरह से खुले और खुल कर पाठक के साथ संवाद भी करे। इस बोलते हुये नवगीत के लिये तुषार जी को वधाई। क्या कहने हैं इन पंक्तियों के -
    " गाँव से लेकर चले जो
    गुम हुए सपने
    गाँठ में
    दम हो तभी
    ये शहर हैं अपने
    यहाँ
    साँचे में सभी
    बाज़ार के ढलते "

    उत्तर देंहटाएं
  8. अति सुंदर! बधाई.

    'भीड़ में
    यह शहर
    पाकेटमार जैसा है
    यहाँ पर
    मेहमान
    सिर के भार जैसा है
    भीड़ में
    तनहा हमेशा
    हम सभी चलते'

    उत्तर देंहटाएं
  9. यह शहर
    पाकेटमार जैसा है
    यहाँ पर
    मेहमान
    सिर के भार जैसा है
    भीड़ में
    तनहा हमेशा
    हम सभी चलते
    वाह सुंदर नवगीत
    saader
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  10. बाँसुरी के
    स्वर कहीं
    वन- प्रान्त में खोए
    माँ तुम्हीं को
    याद कर हम
    देर तक रोए
    धूप में
    हम बर्फ़ के
    मानिन्द हैं गलते

    शतशः बधाई

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