29 अगस्त 2011

१६. मंजिल मंजिल भटक रहा है

मंजिल मंजिल भटक रहा है
कब से ये बंजारा मन

खोज रहा है साँझ सुहानी
कंकरीट के जंगल में
शोर शराबा, हल्ला गुल्ला
भीड़ भरे इस दंगल में

कितनी बार उदास हुआ है
एकाकी आवारा मन ।।


आँखों में रेशम के सपने
ये भी लेकर आया था
किसी समय अपनी बस्ती में
इसने अलख जगाया था

अय्यारों की महाभीड़ में
गुम सुम है बेचारा मन
मंजिल मंजिल भटक रहा है
कब से ये बंजारा मन ।

अर्बुदा ओहरी
(दुबई)

6 टिप्‍पणियां:

  1. अय्यारों की महाभीड़ में
    गुम सुम है बेचारा मन....

    सुन्दर नवगीत...
    सादर

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  2. शहर के अकेलेपन को व्याख्यायित करती अर्बुदा की यह रचना हमें जोडती है उन सन्दर्भों से, जिनके क्षरण से मनुष्य की रागात्मकता खंडित हुई है.
    साधुवाद एक अच्छे नवगीत के लिए| ये पंक्तियां अच्छी लगीं -
    आँखों में रेशम के सपने
    ये भी लेकर आया था
    किसी समय अपनी बस्ती में
    इसने अलख जगाया था

    अय्यारों की महाभीड़ में
    गुम सुम है बेचारा मन

    उत्तर देंहटाएं
  3. खोज रहा है साँझ सुहानी
    कंकरीट के जंगल में
    शोर शराबा, हल्ला गुल्ला
    भीड़ भरे इस दंगल में

    कितनी बार उदास हुआ है
    एकाकी आवारा मन ।

    आह...
    सुंदर नवगीत के लोयें बधाई आपको ..

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  4. बहुत बहुत बधाई इस शानदार नवगीत के लिए अर्बुदा जी को।

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  5. "कविता या गीत को उच्चारण करने में लगने वाले समय के माप की इकाई को मात्रा कहते हैं। "-
    ---यह परिभाषा ही अनर्थक है ...क्या पूरी कविता या गीत उच्चारित किया जाता है मात्रा से.. ? क्या कविता या गीत के स्थान पर अक्षर या वर्ण नहीं होना चाहिए....क्या गद्य में मात्रा नहीं होती... इसीलिये कवि या लेखकके लिए बौद्धिकता व सम्यग ज्ञान आवश्यक है....

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