31 अगस्त 2011

१८. साधो, सपना एक अकेला

मिला हमें कल
महानगर में
साधो, सपना एक अकेला

जनमा था वह पिछले युग में-
बुढ़ा गया है
उसके घर के ठीक सामने
बना निराला हाट नया है

शाम-ढले से
ढली रात तक
वहाँ लगा रहता है मेला

नई बजरिया के खेले
वह समझ न पाता
कुंभनदास हुए थे पहले -
उनसे ही है उसका नाता

आते-जाते
घिसी पनहिया
मिला नहीं पर उसको धेला

पुरखों का घर था उसका
वह ढहा रात कल
दीमक-खाई ड्योढ़ी-चौखट
छत-दीवारें भी थीं खोखल

कब तक टिकता
गये-समय से
गिरवी था वह घर अलबेला

- कुमार रवीन्द्र

5 टिप्‍पणियां:

  1. नए ज़माने के अभिवनव एहसासों को बतियाता सुंदर नवगीत
    नमन

    कुंभनदास हुए थे पहले -
    उनसे ही है उसका नाता

    बहुत खूब

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  2. बहुत सुंदर नवगीत है ये कुमार रवीन्द्र जी का। पूरा नवगीत एक अनोखी लय उत्पन्न कर रहा है। बहुत बहुत बधाई उन्हें नवगीत के लिए।

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  3. नई बजरिया के खेले
    वह समझ न पाता
    कुंभनदास हुए थे पहले -
    उनसे ही है उसका नाता

    आते-जाते
    घिसी पनहिया
    मिला नहीं पर उसको धेला
    .....................सुंदर.. आपको पढ़ना मुझे हमेशा से अच्छा लगता रहा है...बधाई आपको... रविन्द्र सर ...

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  4. शहरों में ज्यों ज्यों मकान विस्तार पा रहे हैं त्यों त्यों मन छोटे होते जा रहे हैं, यह एक त्रासदी है........ बहुत अच्छी तरह से कुमार रवीन्द्र जी ने बहुत सारी बातों को इस नवगीत के माध्यम से सबके साथ साँझा किया है। हार्दिक वधाई।

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  5. आते-जाते
    घिसी पनहिया
    मिला नहीं पर उसको धेला ....sundar prastuti

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