12 सितंबर 2011

२८. महानगर में

कंकरीट के महानगर में रहते हम
सिमटे अपने में अनजाने से ।

लील गया कितने गाँवों को
उभरा तब
चिंता रिश्तों की इसने
बोलो की कब
खत्म रहँट की गूँज, घंटियाँ बैलों की
आती हैं अब कहाँ बुलाने से ।

अपने अपने में गुमसुम
खोए-खोए
चेहरों पर सबके इसने
त्रासद बोए
फुरसत इतनी कहाँ कि हँसकर बात करें
कतराते हैं सब रुक जाने से ।

घर से घर हैं सटे मगर
सब कटे हुए
अपने में सिमटे, अपनो से
हटे हुए
कहाँ तीज-त्योंहार कहाँ कजरी, चैता
नई पौध को लगे पुराने से ।

-कृष्ण शलभ
(सहारनपुर)

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