7 सितंबर 2011

२७. रहता हूँ-एकांत

सुबह शाम
मै अकेला
करता रहा अपने से बात
भी़ड-भा़ड भरे शहर में
रहता हूँ-एकांत ।

ढ़ढू-रहा प्रेम
चारों-ओर नफरत के बाजार
डरा-डरा हर कोई यहाँ पर
किसी-का नही-आधार ।

बिना-स्वार्थ कोई किसी-से
नही-बतियाता
आस-पडोस का मर जाने पर
हलवा-पु़डी खाता ।

नही-दिखता उगता दिनकर
चाँद-भी छुपा रहता-
इस-शहर में हर कोई
अजब-गजब सा रहता ।

ऊँचे-ऊँचे घरोंदे
मन है-छोटा छोटा
खोटा-सिक्का ही यहाँ
बहुत-दूर तक चमकता ।

-पुरुषोत्तम व्यास

2 टिप्‍पणियां:

  1. पुरुषोत्तम व्यास के नवगीत पर डॉ व्योम की प्रतिक्रिया-
    पुरुषोत्तम व्यास की इस कविता में सीधी सीधी बात कही गई है, कुछ प्रतीकों और विम्बों का भी सहयोग ले लिया जाये तो नवगीत और धारदार हो जाता है। अपने इन्हीं विचारों को कुछ इस तरह भी नवगीत में बाँध सकते हैं -----

    सुबह शाम तनहाई पसरी
    किससे बात करें ।

    नफरत का बाजार गरम है
    प्यार कहीं दुबका
    जिसको मौका मिला, उसी ने
    अवसर को लपका

    जंगल नहीं, महाजंगल ये
    छिपकर घात करें ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. श्री जगदीश जी नमस्कार आपके सुझाव के लिये धन्यवाद नवगीत कभी लिखा ही नही परंतु आपका सहयोग रहा तो और भी लिखा जा सकता है,
    अगर आपका मेल पत्ता दे तो अपनी और भी कविता पर सुझाव चाहता हूँ
    धन्यवाद

    पुरूषोत्तम व्यास

    उत्तर देंहटाएं

आपकी टिप्पणियों का हार्दिक स्वागत है। कृपया देवनागरी लिपि का ही प्रयोग करें।