12 सितंबर 2011

३०. एकांत शहर में

सहमे सहमे
से रहते हैं
अब तेरे एकांत शहर में

किश्तों में सब रिश्ते नाते
किश्तों में सब हँसते गाते
किश्तों में साँसें चलती हैं
किश्तों से
आक्रांत शहर में

सब कुछ फ्रीजों एसी वाली
हवा नहीं है देशीवाली
बिन गोली के नींद न आती
कभी किसी को
क्लांत शहर में

जाने किसकी गश्त हुई है
हालत सबकी पस्त हुई है
एकबार जो देख ले इनको
हो जाए
दिग्भ्रांत शहर में

घर में हो बाहर हो चाहे
गड़ी हैं उसपे जोंक निगाहें
मां बहने महफूज नहीं है
कहने को
सम्भ्रांत शाहर में

-शंभु शारण मंडल
(धनबाद)

3 टिप्‍पणियां:

  1. साधुवाद भाई मंडल जी को एक बहुत ही सशक्त नवगीत के लिए|शहर के लिए प्रयुक्त सभी विशेषण बड़े ही सार्थक बन पड़े हैं इस गीत में| ये पंक्तियाँ विशेष रुचीं -

    किश्तों में सब रिश्ते नाते
    किश्तों में सब हँसते गाते
    किश्तों में साँसें चलती हैं
    किश्तों से
    आक्रांत शहर में
    ... ...
    मां बहने महफूज नहीं है
    कहने को
    सम्भ्रांत शहर में

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  2. महानगरीय जीवन की अनेक विद्रूपताओं को मंडल जी ने अपने इस नवगीत में बहुत अच्छी तरह से प्रस्तुत किया है। नगरों में बढ़ रहे अराजक व्यवहार को सटीक वाणी मिली है, वधाई मंडल जी को।

    नवगीत

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  3. बहुत सुंदर नवगीत है ये मंडल जी का। इसके लिए उन्हें बहुत बहुत बधाई।

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