4 अक्तूबर 2011

८. आँगन आँगन दीप

आँगन-आँगन दीप धरें
यह अंधकार बुहरें

होता ही आया तम से रण
पर तम से तो हारी न किरण
जय करें वरण ये अथक चरण
भू-नभ को नाप धरें

लोक-हृदय आलोक-लोक हो
शोक-ग्रसित भव विगत-शोक हो
तमस-पटल के पार नोक हो
यों शर-संधान करें

डूबे कलरव में नीरवता
भर दे कोमलता लता-लता
पत्ता-पत्ता हर्ष का पता
दे, ज्योतित सुमन झरें

- डॉ. राजेन्द्र गौतम
(नई दिल्ली)

4 टिप्‍पणियां:

  1. लोक-हृदय आलोक-लोक हो
    शोक-ग्रसित भव विगत-शोक हो
    तमस-पटल के पार नोक हो
    यों शर-संधान करें

    बहुत खूब.

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  2. वाह! सुन्दर नवगीत...
    विजयादशमी की सादर बधाईयाँ...

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  3. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच 659,चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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