20 अक्तूबर 2011

२३. गीत हैं बिखरे चारों ओर

गीत हैं
बिखरे चारों ओर
मन पतंग को लगे उड़ाने,
उत्सव लेकर डोर,

समाचार
हैं बिछे लान में,
शतरंजी बाज़ी बागान में,
प्याले चाय, कहकहे काफी,
सहेलियों के
झुरमुट झाँकी,
मंद-मंद है पवन सुहानी,
रस भीगी है भोर,

झाँक रहा
कोहरे का दर्पण,
शीतलता से सिहरा आँगन,
त्योहारों के मौसम आए,
खील खिलौने
सबको भाए,
दीप देहरी सजे हुए हैं,
नाच रहे मनमोर

-कल्पना रामानी
(नवी मुंबई)

4 टिप्‍पणियां:

  1. कल्पना जी आपको इस सुन्दर गीत के लिये बहुत-बहुत बधाई,समाचार
    है बिछे लॉन में और सहेलियों के झुरमुट,जैसे शब्द अपने आप में एक सुन्दर रचना प्रतीत हो रही है तो पूरा गीत तो बहुत ही खूबसूरत है |

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  2. बहुत सुंदर नवगीत है कल्पना जी, बधाई स्वीकारें

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  3. खील-खिलौने, झुरमुट झाँकी, जैसे शब्द प्रयोगों ने नवगीत को जीवन्तता दी है. सामयिक परिवेश का सटीक चित्रण... बधाई.

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