8 दिसंबर 2011

९. सपनों का सौदागर

बहु प्रतीक्षित सपनों का सौदागर आया
पाहुन बनकर नया वर्ष
सबके घर आया

आँगन आँगन
अभिनंदन के, चौक सजाए
सबको ऐसा लगे, कोई अपने घर आए
जीवन में फिर कोई स्वर्णिम
अवसर आया

नए वर्ष का
सूरज, सबको बाँटे सोना
हर बच्चे को मिले खेलने नया खिलौना
नया समय अब पहले से
कुछ बेहतर आया

बुझी हुई
आँखों में, सपने जाग उठे हैं
गहन तिमिर में जैसे दीपक राग उठे हैं
प्यासों के अधरों तक चलकर
सरवर आया

समय समंदर
में हम सब, बहते जाते हैं
गहराई में गए वही, मोती पाते हैं
समय पृष्ठ पर सूरज कर
हस्ताक्षर आया

-सजीवन मयंक
होशंगाबाद से

4 टिप्‍पणियां:

  1. प्यासों के अधरों तक चलकर
    सरवर आया...

    समय पृष्ठ पर सूरज कर
    हस्ताक्षर आया...

    अत्यंत सुंदर भाव वाली सुंदर-शांत कविता है...

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  2. संजीवन मयंक जी के इस गीत का अंतिम पद बहुत अच्छा बन पड़ा है और वह विशुद्ध नवगीत की बानगी देता है| मुखड़े में 'बहु प्रतीक्षित' के स्थान पर कुछ और अधिक सहज होता तो अच्छा होता| मयंक जी मेरी इस टिप्पणी को अन्यथा न लें, यही अनुरोध है|

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