12 दिसंबर 2011

१३. नए साल की तस्वीर

नए साल की
उफ! कितनी
तस्वीर घिनौनी है।
फिर
अफवाहों से ही
अपनी आँख मिचैनी है।

वही सभी
शतरंज खिलाड़ी
वही पियादे हैं,
यहाँ हलफनामों में भी
सब झूठे वादे हैं,
अपनी मूरत से
मुखिया की
मूरत बौनी है।

आँगन में
बँटकर तुलसी का
बिरवा मुरझाया,
मझली भाभी का
दरपन सा
चेहरा धुँधलाया,
मछली सी
आँखों में
टूटी एक बरौनी है।

गेहूँ की
बाली पर बैठा
सुआ अकेला है,
कहासुनी की
मुद्राएँ हैं
दिन सौतेला है,
दिन भर बजती
दरवाजे की
साँकल मौनी है।

-जयकृष्ण राय तुषार
इलाहाबाद से

7 टिप्‍पणियां:

  1. भाई जयकृष्ण राय तुषार की इस रचना में नवगीत की दोनों खूबियाँ हैं यानी कथ्य की ताज़गी और कहन का पैनापन| मेरा हार्दिक साधुवाद तुषार भाई को इस श्रेष्ठ नवगीत के लिए! ये पंक्तियाँ मुझे विशेष रुचीं -

    आँगन में
    बँटकर तुलसी का
    बिरवा मुरझाया,
    मझली भाभी का
    दरपन सा
    चेहरा धुँधलाया,
    मछली सी
    आँखों में
    टूटी एक बरौनी है

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  2. Bahut Khub..sach mein kuch aisi hi tasveer hai.
    mere blog par aapka swagat hai.

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  3. बहुत सुंदर नवगीत है जयकृष्न राय जी का, उन्हें बहुत बहुत बधाई।

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  4. बहुत सुन्दर नवगीत के लिए वधाई

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  5. वही सभी
    शतरंज खिलाड़ी
    वही पियादे हैं,
    यहाँ हलफनामों में भी
    सब झूठे वादे हैं,
    अपनी मूरत से
    मुखिया की
    मूरत बौनी है। bahut accha Prabhudayal

    उत्तर देंहटाएं
  6. गेहूँ की
    बाली पर बैठा
    सुआ अकेला है,
    कहासुनी की
    मुद्राएँ हैं
    दिन सौतेला है,
    दिन भर बजती
    दरवाजे की
    साँकल मौनी है।
    सुंदर नवगीत
    वधाई
    rachana

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  7. उत्तम द्विवेदी18 दिसंबर 2011 को 3:53 pm

    सुन्दर नवगीत के लिए बहुत बहुत बधाई।

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