5 जनवरी 2012

कार्यशाला 20, सूरज रे जलते रहना


संक्रांति का पर्व आने ही वाला है। संक्रांति सूर्य के उत्सव का पर्व है। सूर्य, जिसे संस्कृत में पतंग भी कहा गया है। शायद इसीलिये संक्रांति के दिन गुजरात और राजस्थान में पतंग उड़ाने का भी महत्व है। आइये फिर,  इस बार गीतों को सूर्य, संक्रांति, पतंग जैसे अनुभव के आसपास बाँधें, उत्तरायण के बढ़ते हुए दिनों के साथ भागें और मौसम के अलाव तापें, कुल मिलाकर धूप के सुखद अहसास को बाँटें... देखें किसके गीत में कौन सा रंग निखर कर आता है। पता है navgeetkipathshala@gmail.com  और रचना भेजने की अंतिम तिथि है २० जनवरी, जल्दी आने वाली रचनाएँ पहले प्रकाशित हो जाएँगी। रचनाओं का प्रकाशन १५ जनवरी से प्रारंभ कर देंगे।
-नवगीत की पाठशाला

6 टिप्‍पणियां:

  1. पूर्णिमा जी, बहुत अच्छा लगा जानकर...इसके लिये आपका हार्दिक धन्यबाद. इस बार मैं भी इस बिषय पर कुछ लिखने का प्रयास करूँगी :)

    उत्तर देंहटाएं
  2. शन्नो जी आपका स्वागत है, मनमोहन जी नवगीत सीखने के लिये आप फेसबुक के अभिव्यक्ति समूह में आएँ।

    पूर्णिमा वर्मन

    उत्तर देंहटाएं
  3. विमल कुमार हेडा6 जनवरी 2012 को 8:29 am

    बहुत सुन्दर विषय, लिखने एवं सिखने का प्रयास करेंगें
    धन्यवाद
    विमल कुमार हेडा

    उत्तर देंहटाएं
  4. पहली बार यहाँ आना हुआ,अच्छा लगा,आप ने काफी उम्दा विषय चुना है नवगीत के लिए,कुछ लिख सकती हूँ ऐसे तो नहीं कहूँगी,पर कोशिश तो जरुर करना चाहूंगी.....:)

    उत्तर देंहटाएं

आपकी टिप्पणियों का हार्दिक स्वागत है। कृपया देवनागरी लिपि का ही प्रयोग करें।