18 जनवरी 2012

४. किरणों की अगाध नदी

धरती कभी न छोड़े चलना
सूरज कभी न जलना

नवल मुकुल शाखों पर फूटें
पतझड़ कोई बाग न लूटे
दिनकर के धरती से रिश्ते
सदा हरे हों कभी न टूटें
प्रेम की साँसों युगों युगों तक
जीवन में ढलना

गिरें चढ़ें ऋतुओं के पारे
हालातों से हम ना हारें
कर्म रँगेगा जीवन सारे
उस से ही चमकेंगे तारे
सुबह गवाँ दी सोने में तो
शाम हाथ मलना

रात की छाती से ही बहता
स्वप्नों का दुधिया सोता है
अँधियारे के बाद सुबह हो
ऐसा कहाँ सदा होता है
काल की सदियों से आदत है
बगुले सा छलना

धरा धुंध से पटी हुई हो
तमस दृष्टि से सटी हुई हो
किरणों की अगाध नदी फिर
चाहे तट से कटी हुई हो
पौष माघ की सख्ती में
फागुन तुम पलना

-परमेश्वर फुँकवाल
लखनऊ से

16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर गीत .. परमेश्वर फुन्कवाल जी ..
    बधाई

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    1. परमेश्वर फुँकवाल19 जनवरी 2012 को 8:25 am

      आ. श्रीकांत जी आपके उत्साहवर्धन से अभिभूत हूँ. आ. पूर्णिमा जी के स्पर्श से यह गीत इस रूप में संश्लेषित हो सका है. हार्दिक धन्यवाद्.

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    1. परमेश्वर फुँकवाल19 जनवरी 2012 को 11:09 am

      उत्साह वर्धन के लिए धन्यवाद् डॉ रूपचंद्र शास्त्री जी.

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  3. पौष माघ की सख्ती में
    फागुन तुम पलना

    यथार्थ और कल्पना का सुंदर सम्मिश्रण ...
    सुंदर आशा लिए जीवन पथ पर चलाना ...
    जीवन ही कविता है ...
    बधाई एवं शुभकामनायें.

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    1. परमेश्वर फुँकवाल19 जनवरी 2012 को 11:11 am

      पंक्तियों को रेखांकित कर उसकी भावनाओं में एकाकार होने के लिए धन्यवाद् अनुपमा त्रिपाठी जी.

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  4. अँधियारे के बाद सुबह हो
    ऐसा कहाँ सदा होता है
    काल की सदियों से आदत है
    बगुले सा छलना
    बहुत ही सुन्दर गीत है ....प्रकृति के माध्यम से आशंकाओं का भय बहुत प्रभावी लगा ...अति सुन्दर गीत परमेश्वर जी बधाई

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    1. परमेश्वर फुँकवाल19 जनवरी 2012 को 11:15 am

      पंक्तियाँ रेखांकित करती आपकी हर्षाने वाली टिप्पणी के लिए आभार संध्या जी.

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  5. बहुत सुंदर रचना बधाई प्रभुदयाल श्रीवास्तव‌

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    1. परमेश्वर फुँकवाल19 जनवरी 2012 को 11:16 am

      हार्दिक धन्यवाद् आ. प्रभुदयाल श्रीवास्तव जी मनोबल बढ़ाने के लिए.

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  6. बहुत सुंदर नवगीत है परमेश्वर फुन्कवाल जी बधाई!

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    1. परमेश्वर फुँकवाल20 जनवरी 2012 को 11:02 am

      नूतन जी, आपका आभार पसंद करने के लिए.

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  7. बहुत ही सुंदर नगवीत लिखा है परमेश्वर जी, हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए

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    1. परमेश्वर फुँकवाल20 जनवरी 2012 को 11:03 am

      धर्मेन्द्र जी, आपकी शुभ कामनाओं के लिए हार्दिक धन्यवाद्

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  8. 'सुबह गवाँ दी सोने में तो / शाम हाथ मलना, धरती कभी न छोड़े चलना / सूरज कभी न जलना, हालातों से हम ना हारें ' आदि अभिव्यक्तियाँ, मन को बाँधने में समर्थ हैं. समूचे गीत में अनिष्ट की आशंका पर नव निर्माण का आशावादी स्वर हावी है. बधाई.

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    1. परमेश्वर फुँकवाल20 जनवरी 2012 को 11:06 am

      आ. संजीव वर्मा "सलिल" जी, आपकी शुभ कामनाओं एवं उत्साह वर्धक भावनाओं के लिए हार्दिक धन्यवाद्.

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