9 अप्रैल 2012

२१. घटनाएँ हरसिंगार की

गंध-हार की
भीनी-भीनी हैं घटनाएँ हरसिंगार की

उधर रूपसी धूप
नदी पर तैर रही है
इधर हवा ने
छुवन-पर्व की कथा कही है

साँस सुखी है -
कौंध जग रही कनखी के पहले दुलार की

पारिजात का बिरछ
हमारे आँगन में भी
फूल झरे हैं रात
खिले हैं कुछ मन में भी

साखी देतीं
पीतबरन तितलियाँ सुबह के खुले द्वार की

इक पिडुकी का जोड़ा रहता
हरसिंगार पर
वहीं पंछियों के देवा का
है पूजाघर

पत्ते-पत्ते ताल दे रहे
लय-धुन मीठी है बयार की 

कुमार रवीन्द्र
हिसार

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सधा हुआ नवगीत है कुमार रवींद्र जी का। हर शब्द चुन चुनकर रखा गया है। उन्हें बहुत बहुत बधाई

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  2. "उधर रूपसी धूप
    नदी पर तैर रही है
    इधर हवा ने
    छुवन-पर्व की कथा कही है "

    आदरणीय कुमार रवींद्र जी, प्रकृति और शृंगार का सुन्दर मिश्रण है आपके इस नवगीत में| यह पंक्तियाँ तो बहुत कोमल भाव लिए हुए मन को छू गईं |धन्यवाद आपका |

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  3. उधर रूपसी धूप
    नदी पर तैर रही है
    इधर हवा ने
    छुवन-पर्व की कथा कही है
    सुंदर नवगीत है बिम्ब भी बहुत सुंदर हैं
    आपको बधाई
    रचना

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  4. गंध-हार की
    भीनी-भीनी हैं घटनाएँ हरसिंगार की
    bahut sundar rachana. badhai aur sadar naman.

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  5. ऐसे नवगीत मन के बहुत भीतर तक उतर जाते हैं और लम्बे समय तक गीतात्मकता का अहसास दिलाते रहते हैं। कुमार रवीन्द्र जी का यह नवगीत अभीव्यक्ति की न जाने कितनी परतें अपने में समाहित किए है, एक-एक शब्द जिस तरह से चुन चुन कर इस नवगीत को रचा गया है वह सर्वथा असाधारण रचनाशीलता का परिचायक है। कुमार रवीन्द्र जी को हार्दिक वधाई और आभार कि इतना सुन्दर नवगीत पाठशाला को देकर कृतार्थ किया। नदी पर रूपसी धूप का तैरना और हवा द्वारा छुवन पर्व की कथा वाँचने जैसे विम्ब रच देना बहुत बड़ी बात है।

    " उधर रूपसी धूप
    नदी पर तैर रही है
    इधर हवा ने
    छुवन-पर्व की कथा कही है"

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  6. अतीव सुन्दर. नाम नही याद आ रहा है शायद यश मालवीय का गीत था "लेकर चन्द्र कटार सखी तुम धीरे-धीरे, उठी तीज की रात गगन में धीरे-धीरे" की याद ताजा हो गयी. गीत का विम्ब-न्यास सचमुच अनुपम है.

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