18 जून 2012

१८. कब गरमी की रुत जाय

दिन दिन गर्मी
के तेवर से तन मन जन घबराय।
कब गरमी की रुत जाय।

लाय भरी
जब चले पवन तन मन पिघला जाये।
जेठ दुपहरी तपे अगन सी रैन अषाढ़ जलाये
बचपन जाने कहाँ ग्रीष्म कहाँ
धूप तपन और लाय।

पीठ अलाई
गीले बिस्तर रात गुनगुनी तारे गिन गिन
हाथ बिजौना रात न छूटे करवट बदलें पलकें छिन छिन
नींद आय सैं भोर गुजरिया
गाय भैंस रँभाय।

दूर कूक कोयल की
सुन नाचे मन मयूर गुनगुन
छिटपुट मेघों के कतरे छाये नभ छितरे छितरे
अभी कहाँ सावन की आहट
ढांढ़स कौन बँधाय।

आकुल
कोटा

8 टिप्‍पणियां:

  1. र कूक कोयल की
    सुन नाचे मन मयूर गुनगुन
    छिटपुट मेघों के कतरे छाये नभ छितरे छितरे
    अभी कहाँ सावन की आहट
    ढांढ़स कौन बँधाय।

    सुन्दर गीत देशज शब्दों और भाव के साथ ..

    उत्तर देंहटाएं
  2. दूर कूक कोयल की
    सुन नाचे मन मयूर गुनगुन
    छिटपुट मेघों के कतरे छाये नभ छितरे छितरे
    अभी कहाँ सावन की आहट
    ढांढ़स कौन बँधाय।

    सुन्दर गीत देशज शब्दों और भाव के साथ ..

    उत्तर देंहटाएं
  3. मीरा ठाकुर्30 जून 2012 को 9:11 pm

    बहुत सुन्दर गीत है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. jab chale pawan ta man pighala jaye | is pankti men ' chale ' ki jagah par 'bahe' ka prayog hona tha |

    उत्तर देंहटाएं
  5. जब 'चले' पवन तन मन पिघला जाये। यहाँ पर ' चले ' की जगह पर 'बहे ' का प्रयोग होना था | सुन्दर नवगीत है |

    उत्तर देंहटाएं

आपकी टिप्पणियों का हार्दिक स्वागत है। कृपया देवनागरी लिपि का ही प्रयोग करें।