17 जून 2012

१७. गाँव मेरा है

महुए से भरा हुआ गाँव —
गाँव मेरा है।

अनछुआ रहा सब दिन
शहर के कुएँ से
पीता है गंगाजल
खोद कर कुएँ से

खुशबू की बाँहों में गाँव —
गाँव मेरा है।

तपी तपी पगडंडी
जेठ का महीना
सोख रही धूल
अंग अंग का पसीना

जेठी मधु सा मीठा गाँव —
गाँव मेरा है।

मिहनत भर गीत है
हर चेहरा सादा है
यहाँ नहीं बादशाह
यहाँ यही ज्यादा है

यादों में टापू सा गाँव —
गाँव मेरा है।

— राजमणि राय 'मणि

1 टिप्पणी:

  1. अच्छी रचना के लिए राजमणि जी को बधाई, ज्यादा की जगह प्यादा होना चाहिए।

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