20 जून 2012

२०. गर्मी के दिन

अब, साधो
ए.सी. कमरों में
रहते हैं गर्मी के दिन

बाहर आग बरसती
भीतर मौसम है ठंडा
दूर देश से लाया सूरज
राजा का पंडा
रखी गईं हैं
शाही फ्रिज में
उसकी कुछ किरणें कमसिन

कम्प्यूटर पर
झुलसे पेड़ों की तस्वीर दिखी
शाश्वत ने गर्मी पर कविता
उसको देख लिखी
उधर
करौंदे में छिप
मकड़ी जाल रही सपनों का बिन

नदी-घाट पर जाने की
अब किसे भला फुर्सत
चुल्लू पानी में नहायें
यह युग की, सुनो, जुगत
इन्फेक्शन के
डर से
सहमे रहते हैं अबके पल- छिन

-कुमार रवीन्द्र
हिसार

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर नवगीत है। कुमार रवीन्द्र जी की सशक्त लेखनी से निकले एक और शानदार नवगीत के लिए उन्हें बहुत बहुत बधाई।

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  2. आपकी पोस्ट कल 21/6/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें

    चर्चा - 917 :चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  3. कल्पना रामानी21 जून 2012 को 8:58 am

    एक नए अंदाज़ में लिखा हुआ अति सुंदर नवगीत। मुखड़ा तो बहुत ही शानदार है। पूरा गीत बेमिसाल।

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  4. बहुत ही सुन्दर नवगीत ...।
    हार्दिक शुभकामनाएं ।

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