10 जून 2012

९. घने वृक्ष की छाँव

सबको
शीतलता पहुँचाती
घने वृक्ष की छाँव

थका थका सा पथिक
धूप में भूखा प्यासा
बोझिल
मन से
ढूंढ रहा इक ठाँव

जल्दी से सब कुछ निपटाकर
गर्म दोपहरी की बेला में
अलसाया सा
ऊँघ रहा है
जनपद का इक गाँव

शिशु माँ की उँगली थामे
पथ पर
आगे बढ़ता
टुकर टुकर ममता ने देखे
नन्हें नन्हे पाँव

- सुरेन्द्रपाल वैद्य
मण्डी, हिमांचल प्रदेश

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर नव्गीत ...शुभकामनयें ..

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  2. अच्छी रचना के लिए सुरेन्द्रपाल जी को बधाई

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    1. धर्मेन्द्र कुमार जी , सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद ...।

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  3. सुंदर नवगीत के लिए सुरेन्द्र जी को हार्दिक बधाई।

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    1. कल्पना जी , आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए आभारी हुँ ....धन्यवाद !

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  4. इस गीत में लय एक नये आयाम में प्रस्तुत हुई है। बधाई!

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    1. आदरणीय रविन्द्र जी ,
      आपकी प्रेरणादायी प्रतिक्रिया के लिए हृदय से आभारी हुँ ।
      धन्यवाद ...।

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  5. बहुत सुन्दर नवगीत ...अलसाया सा
    ऊँघ रहा है
    जनपद का इक गाँव...बधाई इस सुन्दर नवगीत हेतु

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    1. आपके प्रेरणादायक बधाई संदेश के लिए आभारी हुँ ....।

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  6. परमेश्वर फुंकवाल12 जून 2012 को 8:04 am

    बहुत सुन्दर नवगीत है सुरेन्द्रपाल जी. अंतिम अंतरे की कोमलता अद्भुत है. बधाई आपको.

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  7. गर्म दोपहरी की बेला में
    अलसाया सा
    ऊँघ रहा है
    जनपद का इक गाँव
    जीवंत अभिव्यक्ति... बधाई...

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