25 अक्तूबर 2012

६. बीत गए युग दीप जलाते

बीत गए युग दीप जलाते
कब तक दीप जलायें ।

विजय-पर्व के भ्रम में जीकर
बीती उम्र हमारी,
मिलती रही हमें पग-पग पर
घुटन और लाचारी ,
इन्तजार है ,अपने द्वारे
सुख की आहट पायें ।

आशाओं के दीप जलाये
घर-आँगन-चौबारे ,
अंधकार की सत्ता जीती
हम सदैव ही हारे
जीतेंगे हम ,शर्त एक है
स्वयं दीप बन जायें ।

मन की काली घनी अमावस
होगी ख़त्म किसी दिन ,
उम्मीदों की चिड़ियाँ
आँगन में गायेंगी पल-छिन ,
आओ , स्वागत करें भोर का
मंगल-ध्वनियाँ गायें ।

- त्रिलोक सिंह ठकुरेला

7 टिप्‍पणियां:

  1. जीतेंगे हम ,शर्त एक है
    स्वयं दीप बन जायें ।

    बिलकुल सही कहा आपने ...प्रवाहमयी सुन्दर रचना

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  2. इस सुंदर नवगीत के लिए ठकुरेला जी को बहुत बहुत बधाई

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  3. आओ स्वागत करें भोर का
    मंगल ध्वनियाँ गाएँ ।
    सुन्दर नवगीत के लिए त्रिलोक सिँह ठकुरेला जी को बधाई ।

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  4. जीतेंगे हम ,शर्त एक है
    स्वयं दीप बन जायें

    बहुत सुंदर नवगीत...हार्दिक बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  5. विजय-पर्व के भ्रम में जीकर
    बीती उम्र हमारी,
    मिलती रही हमें पग-पग पर
    घुटन और लाचारी ,
    इन्तजार है ,अपने द्वारे
    सुख की आहट पायें ।
    बहुत सुन्दर। बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  6. हमारी सांस्कृतिक आस्तिकता का गान करता ठकुरेला जी का यह गीत बहुत अच्छा है| |
    आशाओं के दीप जलाये
    घर-आँगन-चौबारे ,
    अंधकार की सत्ता जीती
    हम सदैव ही हारे
    जीतेंगे हम,शर्त एक है
    स्वयं दीप बन जायें।
    दीपपर्व पर आस्था का यह गायन बेहद प्रेरक है| ठकुरेला जी को मेरा हार्दिक अभिनन्दन इस सुंदर गीत के लिए

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  7. मन की काली घनी अमावस
    होगी ख़त्म किसी दिन ,
    उम्मीदों की चिड़ियाँ
    आँगन में गायेंगी पल-छिन ,
    आओ , स्वागत करें भोर का
    मंगल-ध्वनियाँ गायें ।

    इस अभिनव अनुभूति के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।

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