19 दिसंबर 2012

१०. अब तो अपना भाल उठा

बहुत झुकाया अब तक तूने
अब तो अपना भाल उठा

समय श्रमिक!
मत थकना-रुकना
बाधा के सम्मुख
मत झुकना
जब तक मंजिल
कदम न चूमे-
माँ की सौं
तब तक
मत चुकना
अनदेखी करदे छालों की
गेंती और कुदाल उठा

काल किसान!
आस की फसलें
बोने खातिर
एड़ी घिस ले
खरपतवार
सियासत भू में-
जमी- उखाड़
न मन-बल फिसले
पूँछ दबा शासक-व्यालों की
पोंछ पसीना भाल उठा

ओ रे वारिस
नए बरस के
कोशिश कर
क्यों घुटे तरस के?
भाषा-भूषा भुला
न अपनी-
गा बम्बुलिया
उछल हरष के
प्रथा मिटा साकी-प्यालों की
बजा मंजीरा ताल उठा

-संजीव सलिल

4 टिप्‍पणियां:

  1. कृष्ण नन्दन मौर्य20 दिसंबर 2012 को 7:33 am

    खरपतवार
    सियासत भू में-
    जमी- उखाड़
    न मन-बल फिसले
    पूँछ दबा शासक-व्यालों की
    पोंछ पसीना भाल उठा...
    ..नये समय की चुनौतियों से रूबरू कराता और उनसे जूझने की प्रेरणा देता बहुत ही सुंदर गीत.

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  2. ओ रे वारिस
    नए बरस के
    कोशिश कर
    क्यों घुटे तरस के?
    भाषा-भूषा भुला
    न अपनी-
    गा बम्बुलिया
    उछल हरष के
    प्रथा मिटा साकी-प्यालों की
    बजा मंजीरा ताल उठा

    बहुत सुंदर नवगीत ..
    भाषा बिम्ब और कहन के क्या कहने .

    बहुत बधाई आपको सर ..

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  3. माँ की सौं
    तब तक
    मत चुकना
    अनदेखी करदे छालों की
    गेंती और कुदाल उठा
    बहुत सुंदर गीत के लिए संजीव जी को हार्दिक बधाई

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  4. बहुत झुकाया अब तक तूने
    अब तो अपना भाल उठा ।
    प्रेरणास्पद सुन्दर नवगीत के लिए बधाई संजीव जी ।

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