20 दिसंबर 2012

११. आ रहा नववर्ष

भ्रष्टता की
धुन्ध में डूबा हुआ नव वर्ष
आ रहा लेकर नया
अहसास

एक असमंजस
नयन में आँक कर
आ रहा
भीषण समय को लाँघ कर
कुछ खरोंचें देह पर
आतंक की
किन्तु चेहरे पर नया
उल्लास

वक्त की
प्रतिकूलता को जान कर
बैठकर
आया नहीं नभयान पर
सफर बस का भी
नहीं वश में
क्योंकि जरजर है सड़क
इतिहास

कर सका
न रेलयात्रा आज तय
विषखुरानी का
रहा हो स्यात भय
आ रहा पैदल मगर
स्मित अधर
पांव में पहने हुए
आकाश

पं. गिरिमोहन गुरु

3 टिप्‍पणियां:

  1. भाई गिरिमोहन गुरु का यह गीत नवगीत की आज की प्रखर संचेतना एवं भंगिमा की बानगी देता है। रचना का पहला पद तो अद्भुत बन पड़ा है। मेरा हार्दिक अभिनन्दन उन्हें इस श्रेष्ठ कविता के लिए।

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  2. एक असमंजस
    नयन में आँक कर
    आ रहा
    भीषण समय को लांघ कर
    कुछ खरोंचे देह पर
    आतंक की
    किन्तु चेहरे पर नया
    उल्लास
    शब्दोँ का भावपूर्ण बहुत सुन्दर प्रवाह । गिरिमोहन जी को हार्दिक बधाई ।

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  3. बहुत सुंदर नवगीत है गिरिमोहन जी का। उन्हें बहुत बहुत बधाई

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