29 दिसंबर 2012

१६. एक सुबह फिर आई

मंगल सी मुस्कानोंवाली
एक सुबह फिर आई!

ऑन लाइन चौपालें होंगी
खेती चाँद सितारों पर,
मंगल की जब सैर करेंगे
बैठ के देशी कारों पर,
जल जाएँगे दुनियावाले
देख मेरी अंगड़ाई!

स्लेट, किताबें या बस्तों का
बोझ नहीं रह जाएगा,
टैबलेट पर बच्चा सारी
दुनिया को पढ़ जाएगा,
जब चाहेगा पास मिलेंगे
उसके बाबा दाई!

किलिक किलिक से साफ सफाई
लंच, डिनर बन जाएगा,
और किलिक से दिनभर का
हर बोझ खतम हो जाएगा,
फुर्सत से फिर गले मिलेगी
रोज ननद भौजाई!

अंतरिक्ष में ईद, दीवाली
होली खूब मनाएँगे,
धरती माँ को और वहीं
हम पिकनिक पर ले जाएँगे,
चाँद पे अबकी खाएँगे हम
तिलकुट, चूरा, लाई!

शंभु शरण मंडल

1 टिप्पणी:

  1. कल्पनालोक का सुखद अनुभव करवाता नवगीत ।
    शंभु शरण जी को हार्दिक बधाई ।

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