29 जुलाई 2013

१३. चंपा झाँक रही

उधर पड़ौसी-की जाली से
चम्पा झाँक रही !


ख़ूब सुना दो घरों बीच
एक बाड़ ज़रूरी है
रिश्तों को बेहतर रखने की
यह मजबूरी है
किन्तु मुझे यह बाधा होना

भारी अखर रहा
सहना मुश्किल दिल पर
पल-पल सदमा गुज़र रहा
सिक्त पँखुरियों से वह मेरी
पीड़ा आँक रही !


बार-बार झुक जाती है
यूँ मेरे आँगन ओर
बँधी हुई है मानो मुझसे
जनम-जनम की डोर
भरी चाँदनी भी शायद

ऐसे न मुसकाए
दुआ यही करता मन यह
निस-दिन खिलती जाए
यह मृदुला मेरे सपनों में
तारे टाँक रही !


-अश्विनी कुमार विष्णु
अकोला

13 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर नवगीत हेतु अश्विनी जी को बधाई

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  2. बढ़िया नवगीत आपकी लेखनी से।

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  3. सुन्दर भावमय नवगीत।
    हार्दिक बधाई अश्विनी कुमार जी।

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  4. हार्दिक धन्यवाद सज्जन धर्मेन्द्र जी, Surenderpal Vaidya जी सुन्दर अभिप्राय के लिए

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  5. हार्दिक धन्यवाद surenderpal vaidya जी सुन्दर टिप्पणी के लिए

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  6. हार्दिक धन्यवाद जनाब geetfarosh उत्साह बढ़ाते शब्दों के लिए

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  7. आ अश्विनी जी, आप बहुत नए दृष्टीकोण से देखते हैं अपने परिवेश को. यह गीत उसी नव दृष्टी को मुखरित करता है..आपको बधाई..

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  8. हार्दिक धन्यवाद परमेश्वर फुँकवाल जी गीत की विशेष दृष्टि को प्रशंसित करते आत्मीयतापूर्ण मनोभावों के लिए

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  9. achchha geet . nav geet ki parampara ko samridh karta hua. badhai.

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    1. हार्दिक धन्यवाद aviabhi जी कृति को सार्थकता देते अभिप्राय हेतु

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    2. हार्दिक धन्यवाद aviabhi जी कृति को सार्थकता देते अभिप्राय हेतु

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  10. कृष्ण नन्दन मौर्य13 अगस्त 2013 को 10:00 am

    बढ़िया नवगीत

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    1. हार्दिक धन्यवाद कृष्ण नन्दन मौर्य जी सुन्दर टिप्पणी के लिए

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