2 अगस्त 2013

१५. फूल चम्पा के

फूल चम्पा के सब खो गए
जब से हम शहर के हो गए

रात फिर बेसुरी धुन बजाती रही
दोपहर भोर पर मुस्कुराती रही
रतजगों की फसल
काटने के लिए
बीज बेचैनी के बो गए

प्रश्न पत्रों सी लगने लगी जिंदगी
ताका झाकी का मोहताज़ है आदमी
आयेगा एक दिन
जब सुनेंगे यही
लीक पर्चे सभी हो गए

मौलश्री से हैं झरते नहीं फूल अब
गुलमोहर के तले है न स्कूल अब
अब न अठखेलियाँ
चम्पई उंगलियाँ
स्वप्न आये न फिर जो गए

राणा प्रताप सिंह
जैसलमेर (राजस्थान)

3 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर नवगीत के लिए राणा प्रताप सिंह जी को हार्दिक बधाई।

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  2. अच्छा नवगीत है राणा जी का। उन्हें बहुत बहुत बधाई।

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