16 अगस्त 2013

७. उम्मीदें थीं

उम्मीदें थीं
आजादी खुशहाली लायेगी।

रखा सूद पर
जुआ और हल तक बैलों का
बस खुदकुशियाँ ही हल हैं ठण्डे चूल्हों का
तय तो था खलिहानों की
बदहाली जायेगी।

नींव टिकी
सरकारों की दंगों, बलवों पर
लोकतंत्र है पूँजीपतियों के तलवों पर
सोचा तो था सोच गुलामों
वाली जायेगी।

स्वार्थ–बुझे
पासे फिंकते कब से चौसर पर
नग्न–क्षुधित जनतंत्र हारता हर अवसर पर
राजभवन से कब यह नीति–
कुचाली जायेगी।

हल्की
ममता हुई सियासत के हलके में
सरहद से माँ को मिलते हैं धड़ तोहफ़े में
इल्म न था इस तरह लहू की
लाली जायेगी।

–कृष्ण नन्दन मौर्य
प्रतापगढ़

6 टिप्‍पणियां:

  1. रखा सूद पर
    जुआ और हल तक बैलों का
    बस खुदकुशियाँ ही हल हैं ठण्डे चूल्हों का
    तय तो था खलिहानों की
    बदहाली जायेगी।...
    बहुत मार्मिक चित्रण हुआ है आपके नवगीत में, कृष्ण नन्दन जी, हार्दिक बधाई आपको

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    2. हार्दिक आभार आ.कल्पना जी रचना को प्रोत्साहन के लिये

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  2. हल्की
    ममता हुई सियासत के हलके में
    सरहद से माँ को मिलते हैं धड़ तोहफ़े में
    इल्म न था इस तरह लहू की
    लाली जायेगी।
    बहुत ही मर्मस्‍पर्शी। सुंदर नवगीत। बधाई।
    -आकुल

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    1. आभार आकुल जी.. रचना पर आपकी उपस्थिति के लिये

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  3. बहुत खूब कृष्ण नन्दन जी, अच्छा नवगीत है। बधाई स्वीकारें

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