28 जुलाई 2009

छुट्टियों के बाद

10 दिन की छुट्टियों के बाद आज लौटी हूँ तो यहाँ सब थमा थमा सा है। इसके कई कारण हैं।

1- हमने नवगीतों के विषय में कोई स्पष्ट दिशा निर्देश नहीं दिया है इसलिए भ्रम की स्थिति है। क्या नवगीत है क्या नहीं इसे समझने में सदस्यों को कठिनाई हो रही है। यह दिशा निर्देश इसलिए नहीं दिया था क्यों कि नवगीत में प्रयोग की असीमित संभावनाएँ हैं। जिन्होंने पहले नवगीत पढ़े हैं वे उनके आधार पर अपनी दिशा ढूँढ सकते हैं। पिछली तीन कार्यशालाओं में सदस्यों की कठिनाई देखते हुए हम नवगीत की प्रमुख प्रवृत्तियों पर जल्दी ही लेख प्रकाशित करेंगे जिससे सबको यह पता चल जाए कि गीत में वह क्या विशेष है जो उसे नवगीत बनाता है।

2- गर्मी के दिन विषय पर इतने सुंदर गीत आए थे कि हम समझ बैठे सब नवगीत में पारंगत हो गए। लेकिन सुख-दुख विषय पर जो रचनाएँ आई हैं उनमें नवगीत बहुत ही कम हैं। कुछ रचनाएँ गजल की ओर झुकाव रखती हैं तो कुछ सामान्य कविताएँ हैं कुछ लोगों ने छंदमुक्त रचनाएँ भी भेजी हैं। इसलिए मेरी अनुपस्थिति में किस रचना को प्रकाशित किया जाए और किसे नहीं इस विषय में संदेह बना रहा।

3- आलोचना और प्रत्यालोचनाओं का स्वर विनम्र और रचनात्मक नहीं रहा है। इस ओर आलोचना करने वालों और जिनकी आलोचना की जा रही है दोनो ही पक्षों को विनम्र और शांत बने रहने की आवश्यकता है। आलोचना या समीक्षा के लिए रचनाकार को मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए। आलोचना इसीलिए है कि रचनाकार चाहे तो दूसरों के विचारों के उपयोग से अपनी रचना को बेहतर बना सके। यदि रचनाकार को सुझाव पसंद नहीं तो वह उनका प्रयोग न करने के लिए स्वतंत्र है। इसमें विवाद नहीं होना चाहिए। आगे से विवादित और आक्रोश से भरी टिप्पणियों को नवगीत की पाठशाला में प्रकाशित न करने का निर्णय लिया गया है।

आज से हम बची हुई रचनाओं (चाहें वे नवगीत नहीं भी हैं) का प्रकाशन कर रहे हैं। अगस्त माह में कोई कार्यशाला नहीं होगी, इसके स्थान पर कुछ छोटे लेख प्रकाशित करेंगे जिनसे सदस्यों को नवगीत के विषय में जानकारी मिलेगी। इनका उद्देश्य है कि सदस्यों को नवगीत को अच्छी तरह समझने में सहायता मिले, जिससे वे सही नवगीत लिख सकें। सभी सदस्य इन लेखों पर अपने विचार प्रकट कर सकते हैं। बहस में हिस्सा लेने के लिए सबका स्वागत है। --पूर्णिमा वर्मन

4 टिप्‍पणियां:

  1. पूर्णीमा जी,

    लेख के लिये धन्यवाद। नये मार्ग पर चलते चलते दिशा निर्देश की आवश्यकता तो रहती है । अत: आगामी लेखों की प्रतीक्षा रहेगी ।

    शशि पाधा

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  2. पुर्णिमा जी,
    कार्यशाला पर तक़रीबन रोज़ ही निगाह डालने की आदत सी हो गई है इसलिये मन दुविधा में था कि आख़िर क्या बात हुई जो गीतों की यह यात्रा थमने लगी है, लेकिन आपका लेख आते ही सब साफ़ हो गया। अगले महीने आने वाले नवगीतों से संबन्धित लेखों का इंतज़ार रहेगा, जिससे आगे और सीखने को मिलेगा। कार्यशाला के दोबारा शुरू होने का भी इंतज़ार रहेगा। धन्यवाद

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  3. व्‍यक्ति कभी भी पारंगत नहीं होता, उसे हमेशा ही मार्गदर्शन की आवश्‍
    यकता रहती है। आप के आलेखों का इन्‍तजार है, लिखें और कठोरता से हमारी गल्तियों को भी बताएं।

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  4. पूर्णिमा जी !
    मैं पथ भूला सा आपकी कार्यशाला में आ पहुंचा था ।किंतु मेरी भूल एक नया झरोखा खोल गयी। नवगीत से परिचय, और क्रमशः अधिकाधिक जानकारी अब नये लेखों से लेने का सुख ले पाउंगा।
    मेरी रचना निश्चय ही नवगीत नहीं है।
    स-खेद

    प्रवीण पंडित

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