30 जुलाई 2009

१०- सुख की धूप ग़म की छाँव

सुख की धूप है तो गम की छाँव भी
जीवन है सपनों का गाँव भी

अभिलाषा की गठरी खोल
हर चाहत का यहाँ है मोल
हार जीत का लगा है मेला
चल ले तू एक दाँव भी
जीवन है सपनों का गाँव भी

कभी उलटी बहे पुरवाई
कोयल न बोले अमराई
वख्त बुरा जो आता है
साथ छोड़ देतें हैं पाँव भी
जीवन है सपनों का गाँव भी

सब कुछ खोया तो ये जाना
घर की चौखट को पहचाना
अपनी धूप तो आखिर अपनी
सुख दे न पराई छाँव भी
जीवन है सपनों का गाँव भी

--रचना श्रीवास्तव

3 टिप्‍पणियां:

  1. नवगीत लिखने का अच्छा प्रयत्न किया गया है।" सुख की धूप है तो गम की छाँव भी " शायद हेमन्त ॠतु की धूप छाँव का वर्णन होगा,पर आगे चलकर छाँव सुख के रूप में बदल गई है "सुख दे न पराई छाँव भी" एक ही गीत में यह विसंगति है। अन्तरों की तीसरी पंक्तियों में एक रूपता नहीं है।उन्हें इस तरह किया जा सकता है॒।
    साथ छोड़ते पाँव भी
    दुखद पराई छाँव भी

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  2. mujhe to geet bahut pasand aaya .
    कभी उलटी बहे पुरवाई
    कोयल न बोले अमराई
    वख्त बुरा जो आता है
    साथ छोड़ देतें हैं पाँव भी
    जीवन है सपनों का गाँव भी
    kya hi sunder likha hai
    mahesh

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  3. yadi is ko ase kar dun to gamki dhoop hai to sukh ki chhanv bhi to ek galti to theek hojayegu na

    saath chhod dete panv bhi tsamajh me aaya ki hai nikal diya jaye
    pr sukh de na parai chhanv bhi nahi samajh aaya

    please bataiye .
    saader
    rachana

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