1 दिसंबर 2009

१५-फिर दिवाली आई है

मन के दीप जले फिर दिवाली आई है
अमावस को हरने फिर दिवाली आई है

न हो छल विषाद मनों में अब
द्वेष हटा प्रेम में हों लीन सब
बुराई का विनाश कर अच्छाई छाई है ।
अमावस को हरने फिर दिवाली आई है ।।

तिमिर मार रोशन हो जग अब
सब के मन से मिटे कालिमा अब
रावण मार रामजी ने कैसी लीला रचाई है।
अमावस को हरने फिर दिवाली आई है ।।

उजला हो मन सब का अब
दीप जला जागो इन्सान अब
सौहार्द औ प्रेम की छटा चहुँ ओर छाई है।
अमावस को हरने फिर दिवाली आई है ।।

मन के दीप जले फिर दिवाली आई है ।
अमावस को हरने फिर दिवाली आई है ।।

--अरविन्द चौहान

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी रचना है। भाव, विचार और शिल्प सभी प्रभावित करते हैं। सार्थक और सारगर्भित प्रस्तुति ।

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