3 जनवरी 2010

५-कुहासे से घिरा दिनमान

मन कुहासे से घिरा दिनमान
खोता जा रहा पहचान

शून्य वन में राह भूले पथिक सी
लाचार मानवता
सभ्यता के मंच पर अध्यक्ष हित
तैयार दानवता
बुद्धिवादी सिर फिरा इन्सान
होता जा रहा पाषाण

साँझ सूने घाट पर बैठा हुआ
धीवर बना मानव
मछलियों को फाँसने को ढूँढता
तरकीब बन दानव
सिर्फ पाने के लिये सम्मान
खोता जा रहा ईमान

--गिरिमोहन गुरु

8 टिप्‍पणियां:

  1. ’सकारात्मक सोच के साथ हिन्दी एवं हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रचार एवं प्रसार में योगदान दें.’

    -त्रुटियों की तरफ ध्यान दिलाना जरुरी है किन्तु प्रोत्साहन उससे भी अधिक जरुरी है.

    नोबल पुरुस्कार विजेता एन्टोने फ्रान्स का कहना था कि '९०% सीख प्रोत्साहान देता है.'

    कृपया सह-चिट्ठाकारों को प्रोत्साहित करने में न हिचकिचायें.

    -सादर,
    समीर लाल ’समीर’

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  2. बहुत अच्छा नवगीत और विशेष ये पंक्तियां,,,,
    शून्य वन में राह भूले पथिक सी
    लाचार मानवता
    सभ्यता के मंच पर अध्यक्ष हित
    तैयार दानवता
    बुद्धिवादी सिर फिरा इन्सान
    होता जा रहा पाषाण

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  3. बहुत अच्छा नवगीत है। गिरिमोहन गुरु जी के सभी गीत शानदार रहे हैं अभी तक बधाई।

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  4. मन कुहासे से घिरा दिनमान
    बुद्धिवादी सिर फिरा इन्सान
    होता जा रहा पाषाण
    सिर्फ पाने के लिये सम्मान
    खोता जा रहा ईमान
    सत्य कथन है. Thank you.

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