12 जनवरी 2010

११- यामा बीत गई

उठ जाग रे, यामा बीत गयी,
सदियों का कोहरा छटा,
आशा का हुआ प्रभात,
गा नव प्रभात का गान,
कि यामा बीत गयी.

नभ-वातायन से अंशुमान
ने झांक, दिया सन्देश-
तारागण गये किस देश,
अब रहा न कोहरा शेष,
कि यामा बीत गयी,

खुशियों का हुआ उदय,
कर नव प्रभात का स्वागत
गा राग रागिनी,
छेड़ भैरवी तार,
व मालकोंश की तान,
कि यामा बीत गयी

सपनों को अब छोड़,
नयन तू खोल,
बादलों की रजत-सुनहरी
शैय्या का कर त्याग
उठ, कर निर्माण की बात
खग कुल कुल करें शुभ गान,
कि यामा बीत गयी .

उठ जाग रे, यामा बीत गयी,

शारदा मोंगा
ऑकलैंड

13 टिप्‍पणियां:

  1. धन्यवाद, मैं अति प्रसन्न हूँ. आत्म विश्वास को बल मिला है.

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  2. रचना अच्छी है भाव अच्छे हैं छायावादी युग की याद दिलाने की ओर ले जाती है पर यामा शब्द का प्रयोग रात्रि के अर्थ करना कुछ ठीक नहीं लगता। फिर नवगीत की दृष्टि से पहले अंतरे में 5 पंक्तियाँ, दूसरे में 6 और तीसरी में 7 उचित नहीं प्रतीत होते हैं। इन पर ध्यान दे सकें और कविता में कुछ और नया पन ला सके तो और भी अच्छा होगा।

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  3. हम तो यामा में भी जाग रहे हैं,
    आपका नवगीत पढ़ते हुए!

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  4. सपनों को अब छोड़,
    नयन तू खोल,
    बादलों की रजत-सुनहरी
    शैय्या का कर त्याग
    उठ, कर निर्माण की बात
    खग कुल कुल करें शुभ गान,
    कि यामा बीत गयी .
    शारदा जी, बहुत भावभीनी पँक्त्तियाँ हैं यह । वैसे तो पूरा नवगीत ही मधुर है। एक सुन्दर रचना के लिये बधाई । आगामी गीतों की प्रतीक्षा रहेगी।

    शशि पाधा

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  5. धन्यवाद आप सबको: आचार्य सलिलजी, रावेंद्रजी और शशिजी,
    आपका स्वागत है.

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  6. आप सब का स्वागत है: आचार्य सलिलजी, रावेंद्रजी तथा शशिजी. धन्यवाद.
    मैं अति प्रसन्न हूँ. आत्म विश्वास को बल मिला है.
    अपनी कमियों पर भी धयान दूंगी

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  7. धन्यवाद सुरुचिजी, आपके सुझाव सर माथे पर. भविष्य के लिए अवश्य ही लाभप्रद होंगे.

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  8. स्वागत है शारदा जी, आप अच्छा लिख रही हैं। पाठशाला में आपकी पहली रचना है इसलिए फ़िक्र की कोई बात नहीं। बस निरंतरता बनाए रहें। आपकी भाषा शैली आदि नवगीत के अनुकूल आसानी से ढल जाएगी।

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  9. यामा यानी रात ये शायद मैंने पहली बार पढ़ा पर बाकी रचना बहुत अच्छी..

    दीपिका जोशी'संध्या'

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  10. रात्रि (चतुर्थ याम)माता की तरह गोद में ले सुलाती है अत उसे मैंने 'याम' न कह कर यामा नाम दिया किया है

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