18 जनवरी 2010

१७-मन सिहरा जाए

तन सिहरे
मन सिहरा जाए

सावन बीत गया
मैं प्यासी
अब सर्दी में घोर उदासी
ठिठुर गए हैं सपने अपने
अरमानों
पर कोहरा छाए

धुंध घिरे
पाला जो बरसे
तेरे लिए दो नैना तरसे
सीने से ऑँचल छीने जब
बेदर्दी
ये सर्द हवाएँ

साँझ हो
या भिनसार सँवरिया
कठुआए कमसिन उमरिया
पोर पोर में पीर विरह की
मीठा-
मीठा दर्द जगाए

पल पल
पाछ रहा है पछुआ
जैसे डंक लगाए बिछुआ
बर्फ हुआ है रक्त नसों का
जाने कब
सांसे थम जाए

शंभु शरण मंडल
धनबाद झारखंड

22 टिप्‍पणियां:

  1. beshak "jane kab saanse tham jaae" shambhujiyeh ek sundar sringar manthan hai jo thithuran me bhi ushnta sanjoe hue hai . muarak ho yeh geet ham pathko ko , team navgeet ko our jane anjane sabko
    rajkisore

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  2. पोर-पोर में पीर विरह की,
    मीठा-मीठा दर्द जगाए!

    इन पंक्तियों ने तो कोहरे का
    दिया सारा दर्द ही भुला दिया!
    --
    मिलत, खिलत, लजियात ... ... ., कोहरे में भोर हुई!
    लगी झूमने फिर खेतों में, ओंठों पर मुस्कान खिलाती!
    संपादक : सरस पायस

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  3. वाह खूब मज़ा आ रहा है. दिन पर दिन एक से एक अच्छे नवगीत प्रकाशित हो रहे हैं। यह कार्यशाला तो शायद गर्मी के दिन शीर्षक के बाद दूसरी बड़ी सफल कार्यशाला बन गई है। रावेन्द्र जी, आपने खूब रौनक लगाई हुई है। बधाई हो!!

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  4. Sri Shambhu Sharan Mandalji ki kavita ek lajawab rachna hai jismen unke kavi man ki chhatpatahat 'man sihra jaye' men prakat ho raha hai. Unmen apne thithure sapne ki virah vedna se bahar nikal ane ki chahat dikhai deti hai.

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  5. सुरुचि जी!
    जब कोई "अच्छा, मन से सच्चा"
    मेरा मनोबल बढ़ाता है,
    तो मुझे कई गुना ज़्यादा ऊर्जा मिल जाती है
    और मेरी रुचि कुछ रचने में बढ़ जाती है!
    --
    यदि कमेंट जल्दी-जल्दी प्रकाशित होते रहें,
    तो रौनक निरंतर बनी रहती है!
    आपका आभार!

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  6. आपके इस नवगीत में विचार, अभिव्यक्ति शैली-शिल्प और संप्रेषण के अनेक नूतन क्षितिज उद्घाटित हो रहे हैं।

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  7. ...मैं प्यासी
    ...सर्दी में घोर उदासी
    ठिठुर गए हैं सपने अपने
    अरमानों पर कोहरा छाए...
    मीठा मीठा दर्द जगाए'
    ...
    क्या कहना है! उत्कृष्ट रचना.
    Thank you.

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  8. "saanjh ho ya bhinsaar sanvarya kathuae kamsin umariya]
    por-por me peer virah kee
    meetha-meetha dard jgae " sihran se sarabor in panktiyo me bejod v bebak garmahat hai,bas ise bane rakhie shambhuji,team anubhuti ko bhi heartiest thanks.

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  9. Adarniya Mandal jee,
    Congratulations,
    aapki kabita bahut achi hai. Filo me dube rahne ke babjud etni achi rachna ke liye aap vadahi ke patra hai.

    Ajay Kr. Singh,
    Assistant, CIMFR

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  10. साँझ हो
    या भिनसार सँवरिया
    कठुआए कमसिन उमरिया
    पोर पोर में पीर विरह की
    मीठा-
    मीठा दर्द जगाए

    उत्कृष्ट रचना
    बहुत मज़ा देने वाले गीत इस पाठशाला में प्रस्तुत हो रहे हैं..
    बधाई
    दीपिका जोशी 'संध्या'

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  11. अछूते शब्द-चयन के बावजूद बिम्ब और प्रतीकों का टटकापन मन मोहता है.

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  12. respected sir,

    "man sihra jayen" jaisi rachana abhi ke mausam me man ki byatha ka behad sundar waranan karta hai. kafi bhawuk aur dil ko chhu lene wali panktiya behad satik tarike se present ki gayi hai.
    Aapke iss sunder rachana ke liye maihardik badhai deta hoon.

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  13. congratulations. Bahut sundar rachna hai. sabdo ka kafi accha prayog kiya gaya gai.

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  14. shambhu sharan mandal ji ki kavita ka kya kahna, bar bar padhne ki dil karta hai

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  15. aisi kavita likhe hai sir ki tariff karne keliye meri bhasha kam par jaye

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  16. धुँधले कोहरे में विरह का चित्रण और सुन्दर शब्द संयोजन है इस नवगीत में। धन्यवाद इस सुन्दर रचना के लिये।

    शशि पाधा

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  17. mandalji,
    You are the best as always.
    Keep writing and try to get the compilation published.
    I can visualize a great poet in you whom the world will appreciate very soon.
    Great going, congrats!
    T Ajay Kumar

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  18. ofcourse very nice geet " man sihra jae" congrats to ss mandal for this colourful composing.pl keep it continue
    thanks to team navgeet for this collection
    K B Singh

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  19. श्रीधर खिस्ते23 जनवरी 2010 को 12:22 pm

    आपकी यह रचना बहुतही शानदार है। इस सुन्दर रचना के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।

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