15 जनवरी 2010

१५-गीत का बनकर विषय

आचार्य संजीव सलिल का यह गीत- जो गीत तो है ही विषय से संबंधित भी है। गिरि मोहन गुरु के छंद पर चलते हुए एक आशीर्वाद भी है सभी प्रतिभागी सदस्यों के लिए -

गीत का बनकर
विषय जाड़ा
नियति पर अभिमान करता है

कोहरे से
गले मिलते भाव
निर्मला हैं बिम्ब के नव ताव
शिल्प पर शैदा हुई रजनी-
रवि विमल सम्मान करता है
गीत का बनकर
विषय जाड़ा
नियति पर अभिमान करता है

फूल-पत्तों
पर जमी है ओस
घास पाले को रही है कोस
हौसला सज्जन झुकाए सिर-
मानसी का मान करता है
गीत का बनकर
विषय जाड़ा
नियति पर अभिमान करता है

नमन
पूनम को करे गिरि-व्योम
शारदा निर्मल, निनादित ॐ.
नर्मदा का ओज देख मनोज-
'सलिल' संग
गुणगान करता है.
गीत का बनकर
विषय जाड़ा
खुदी पर अभिमान करता है

10 टिप्‍पणियां:

  1. वाह, आचार्य जी, आपने तो कमाल कर दिया!
    आपका ऐसा आशीष पाकर हम सब धन्य हो गए!

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  2. बहुत खूब मज़ा आया। यह संवदेनशील जुड़ाव आदरणीय है।

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  3. आचार्य जी आपके इन सुंदर आशीर्वचनों से वे धन्य हुए जिनके नाम इस रचना में हैं। काम मैंने भी अपनी रचना भेजी होती तो मेरा भी नाम यहाँ होता... :(

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  4. इस नवगीत में अनेक मोती पिरो कर नवगीतमाला को सौंदर्य प्रदान किया है. धन्यवाद.

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  5. ’सलिल’ जी के गीत में नाम आया, ’सज्जन’ धन्य हो गया। आभार।

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  6. आचार्य जी का आशीर्वाद गीत के रूप में मिला बहुत बहुत धन्यवाद, सभी मोतियों को एक माला में पिरो कर जो गीत बनाया वह बहुत अच्छा लगा पढ़कर आनंद आया
    विमल कुमार हेडा

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  7. आचार्य जी का आशीर्वाद गीत के रूप में मिला बहुत बहुत धन्यवाद, सभी मोतियों को एक माला में पिरो कर जो गीत बनाया वह बहुत अच्छा लगा पढ़कर आनंद आया
    विमल कुमार हेडा

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  8. क्या कहने इस आशीर्वाद रूपी गीत के... जिनके नाम है इस गीत में..उन्हें कितनी खुशी मिली होगी.. हमारे जैसे पाठकों को ही खूब भाया है ये नवगीत...

    दीपिका जोशी 'संध्या'

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  9. आशीर्वाद देने का कितना अनूठा ढँग मिला इस गीत में। पढ़ कर मन प्रसन्न हुआ।

    सादर, शशि पाधा

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