20 फ़रवरी 2010

६- फागुनी फुहारें : डॉ. कुमार गणेश


तन में हिलोर उठे,मन में हिलोर उठे,
छाया ऐसा रंग प्यारा,नाच पोर-पोर उठे
मन की गली में बज रही शहनाई है,
आयी मेरे यार देख,ऐसी होली आयी है |

दिन के चढ़े ये मन मस्त हुआ है,
महकी हवा में देखो,क्या नशा छाया है,
शाम ढले लगे ये दुनिया सुहानी है,
सब के दिलों में ऐसा प्रेम पियारा है,
नदिया में दिल की ये रवानी आयी है,
आयी मेरे यार देख,ऐसी होली आयी है

छोड़ उदासी को ये तन-मन खुश है,
मस्त हुआ अब जीवन अपना,
फाग की फुहारें देखो,कैसी हैं छायी,
सच हो चला है अब हर इक सपना,
प्रीत की परंपरा में आयी तरुनाई है,
आयी मेरे यार देख,ऐसी होली आयी है

दिल में बसा लो उसे,जिस ने छुआ है मन,
भावना के रंग करो उस के अर्पण,
तन-मन जिस को मिले हैं कलियों के,
बन-बन फूल खिले हैं खुशियों के,
प्यास में मन की बड़ी गहराई है,
आयी मेरे यार देख ऐसी होली आयी है

फागुनी फुहारें आयीं फागुन महीने में
अब रंग आया कुछ अपने भी जीने में
मन की गली में चहुँ ओर फूल बिखरे
फाग के रंग में सपने भी निखरे
मन के गगन पे प्रेम घटा छाई है,
आयी मेरे यार देख,ऐसी होली आयी है
--
डॉ. कुमार गणेश
जयपुर (राजस्थान)

11 टिप्‍पणियां:

  1. Faaguni fuaare girane kiye bahut bahut dhaywaad!Ab lagata hai ki waakai holi aai....bahut acchi lagi rachana.
    Saadar
    http://kavyamanjusha.blogspot.com/

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  2. दिल में बसा लो उसे,जिसने छुआ है मन
    भावना के रंग करो उस के अर्पण

    सुन्दर अभिव्यक्ति
    मुबारक मुबारक

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  3. बहुत सुंदर लगे यह बसंत के रंग.
    धन्यवाद

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  4. बेशक इसे लोकधुन में रचा एक गीत कहा जा सकता है पर नवगीत के मानदंडों को यह पूरा नहीं करता है। वसंत के इस नए रंग को कार्यशाला में प्रस्तुत करने के लिए बधाई।

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  5. सुरसुरी-सा मुदित होकर,
    मन-गगन पर सज गया उल्लास!
    आया मन-बसन मधुमास!!
    --
    तुम मुझे नवगीतिका-सी
    भा रही हो!
    फागुनी सुर दीपिका-सी
    गा रही हो!
    हो रहा है प्रीत का आभास!
    आया मन-बसन मधुमास!!
    --
    सुरुचि जी की टिप्पणियाँ स्वागत-योग्य हैं!

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  6. दिल में बसा लो उसे,जिस ने छुआ है मन,
    भावना के रंग करो उस के अर्पण,


    सुन्दर....

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  7. तन-मन जिस को मिले हैं कलियों के,
    बन-बन फूल खिले हैं खुशियों के,

    सुन्दर!

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  8. "faguni fuharen" padh kar sach chhua anchhua sabko dil me basane ka man karta hai
    thanks

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  9. फागुनी फुहारें आयीं फागुन महीने में
    अब रंग आया कुछ अपने भी जीने में
    मन की गली में चहुँ ओर फूल बिखरे
    फाग के रंग में सपने भी निखरे
    मन के गगन पे प्रेम घटा छाई है,
    आयी मेरे यार देख,ऐसी होली आयी है
    वसन्त के उल्लास में आनन्दित,तरंगित मनोभवों से ओतप्रोत यह नवगीत एक मनोरम रचना है ।
    धन्यवाद तथा बधाई ।
    शशि पाधा

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  10. सुरुचि से सहमत. ऐसी श्रेष्ठ रचनाएँ जो नवगीत से इतर हों अंत में परिशिष्ट में दी जा सकें तो नवगीतकारों को भ्रम न होगा.

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