23 फ़रवरी 2010

९-रंगों का नव पर्व बसंती : संजीव सलिल


रंगों का नव पर्व बसंती
सतरंगा आया
सद्भावों के जंगल गायब
पर्वत पछताया

आशा पंछी को खोजे से
ठौर नहीं मिलती.
महानगर में शिव-पूजन को
बौर नहीं मिलती.
चकित अपर्णा देख, अपर्णा
है भू की काया.
सद्भावों के जंगल गायब
पर्वत पछताया

कागा-कोयल का अंतर अब
जाने कैसे कौन?
चित्र किताबों में देखें,
बोली अनुमानें मौन.
भजन भुला कर डिस्को-गाना
मंदिर में गाया.
सद्भावों के जंगल गायब
पर्वत पछताया

है अबीर से उन्हें एलर्जी,
रंगों से है बैर
गले न लगते, हग करते हैं
मना जान की खैर
जड़ विहीन जड़-जीवन लखकर
'सलिल' मुस्कुराया
सद्भावों के जंगल गायब
पर्वत पछताया
--
संजीव सलिल

15 टिप्‍पणियां:

  1. अपर्णा चकित अपर्णा देख,
    अपर्णा है भू की काया. paNktiyaN achchhi lagi
    चित्र किताबों में देखें,
    बोली अनुमानें मौन. yahaN nichali pankti ko nahi samajh payi

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  2. गीत में दोहा छन्द का प्रयोग
    सुन्दरता से किया गया है!

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  3. आचार्य जी,
    लाजवाब नवगीत! बधाई! मुझे बस बौर के लिंग को लेकर संशय है। मैं इसे पुल्लिंग समझता हूँ। मार्ग दर्शन चाहूँगा।
    सादर

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  4. कागा-कोयल का अंतर अब
    जाने कैसे कौन?
    चित्र किताबों में देखें,
    बोली अनुमानें मौन.
    भजन भुला कर डिस्को-गाना
    मंदिर में गाया.
    सद्भावों के जंगल गायब
    पर्वत पछताया

    बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ , पूरी रचना बहुत ही सुन्दर लगी संजीव सलिल साहब को बहुत बहुत बधाई धन्यवाद
    विमल कुमार हेडा

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  5. वाह सलिल जी, एलर्जी और हग को हिंदी में ऐसा जोड़ा है कि कोई कहेगा नहीं कि ये अंग्रेज़ी शब्द हैं। पिछली रचना में जहाँ अमित जी ने पर्यावरण, संस्कृति और पूँजीवाद पर चिंता व्यक्त की थी वहीं इस रचना में सलिल जी ने संस्कृति पर ही आधारित तीन मुद्दों को तीन अलग रंगों में प्रस्तुत किया है। नवगीत की कार्यशाला तो सचमुच जम रही है।

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  6. सलिल जी के नवगीतों से हम जैसे बच्चों को बहुत कुछ सीखने को मिलता है। एक बार फिर सुन्दर नवगीत लिखने के लिए बधाई।

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  7. है अबीर से उन्हें एलर्जी,
    रंगों से है बैर
    गले न लगते, हग करते हैं
    मना जान की खैर
    जड़ विहीन जड़-जीवन लखकर
    BAHUT SUNDER .
    SAADER
    RACHANA

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  8. true.


    पाश्चात्य नकल कर
    मोडर्न बन
    न घर के रहे
    न बाहर के
    व्हिस्की बीयर की हो मर्जी
    गुलाल अबीर से एलर्जी,
    सद्भावों के जंगल गायब
    अजब रंगों का पर्व बसंती

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  9. "आशा पंछी को खोजे से
    ठौर नहीं मिलती.
    महानगर में शिव-पूजन को
    बौर नहीं मिलती"
    अच्छी रचना है, नवगीत के काफी निकट भी है पर "ठौर नहीं मिलती" और " बौर नहीं मिलती" की जगह "आशा पंछी को खोजे से
    ठौर नहीं मिलता.
    महानगर में शिव-पूजन को
    बौर नहीं मिलता" हो तो रचना शुद्ध हो जाएगी। .

    -अरविन्द कुमार

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  10. सदैव की तरह ,सलिल जी को पढ़ना सुखकर है।
    परदेसी शब्दों का गीत मे रच बस जाना बहुत अच्छा लगा।

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  11. है अबीर से उन्हें एलर्जी,
    रंगों से है बैर
    गले न लगते, हग करते हैं
    मना जान की खैर
    जड़ विहीन जड़-जीवन लखकर



    नमन मेरा.....

    अंग्रेज़ी शब्दों का सुंदर प्रयोग...
    .नये प्रयोगों को बढावा दे रहा है.......

    बधाई....आपको

    गीता पंडित

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  12. आदरणीय सलिल जी,
    बदलते हुए सामाजिक तथा सांस्कृतिक मूल्यों की और ध्यान दिलाता हुआ आपका यह नवगीत बहुत ही अच्छा लगा । आपकी रचनाओं से बहुत कुछ सीखने को मिलता है । एक बार फिर से धन्यवाद ।

    शशि पाधा

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  13. "kaga koyal ka antar ab jane kaise kaun
    chitra kitabon me dekhen ,
    boli anumane maun
    bhajan bhulakar disco gana
    mandir me gaya
    sdhhavon ke jangal gayab
    pavat pachhtaya"
    videshj shabdon ke bavjood sahaj lay v tal sarabore hai yeh rachna acharyaji ko sadhuvad

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  14. 'ठौर' और 'बौर' दोनों ही शब्द कोष के अनुसार पुल्लिंग हैं किन्तु इस ओर इन्हें लोकभाषा में स्त्रीलिंग की तरह बोला जाता है.पाठक अपने अनुकूल परिवर्तन कर सकते हैं. अमित तथा अरविन्दजी का विशेष आभार...ऐसी प्रतिक्रियाओं से ज़ाहिर होता है कि पाठक कितने सजग हैं.

    वन्दना जी!
    कागा-कोयल का अंतर अब
    जाने कैसे कौन?
    चित्र किताबों में देखें,
    बोली अनुमानें मौन. ''yahaN nichali pankti ko nahi samajh payi''

    यहाँ पक्षियों की नस्लें समाप्त होने की चिंता अनकहे ही कह दी गयी है. जब कागा (कौआ) और कोयल (पिक) दोनों समाप्त हो रहे हैं तब उनका अंतर कैसे जान सकेंगे? चित्र तो किताबों में मिल जायेंगे पर उनकी बोली का तो गुमसुम रहकर अनुमान ही करना होगा. 'काकः कृष्णः पिकः कृष्णः, को भेदों पिक काकयो? / वसंत काले संप्राप्ते, काकः काकः, पिकः पिकः..' जैसे श्लोकों को भावी पीढी कैसे समझ सकेगी. गीत में अन्यत्र भी 'जंगल गायब', पर्वत पछताया, अपर्णा है भू की काया, जड़ विहीन जड़-जीवन आदि से पर्यावरन-प्रदूषण के प्रति चिंता व्यक्त की गयी है.

    रचना को सराहनेवाले सभी पाठकों को हार्दिक धन्यवाद.

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  15. कागा काको धन हरे?, कोयल काको देत.
    मीठी बानी बोल के, जग बस में कर लेत..

    को समझने के लिए 'बानी' सुना पाना अनिवार्य है.

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