24 फ़रवरी 2010

१०- आए कैसे बसंत? : रावेंद्रकुमार रवि

मौसम की माया है,
धुंध-भरा साया है –
आए कैसे बसंत?

रोज़-रोज़ काट रहे
हर टहनी छाँट रहे!
घोंसला बनाने को
कैसे वे आएँगे?
सुन उनका कल-कूजन
क्या अब अँखुआएँगे?

नन्हे उन पंखों को
पाए कैसे अनंत?
स्वरलहरी डूब रही
गाए कैसे बसंत?
आए कैसे बसंत?

कचरे से पाट रहे
ख़ुशियों को डाँट रहे!
महक भरे झोंके अब
कैसे आ पाएँगे?
नेह-भरे सपने अब
कैसे मुस्काएँगे?

सपनों का इंद्रधनुष
पाए कैसे दिगंत?
मन-कुंठा फूल रही
भाए कैसे बसंत?
आए कैसे बसंत?

--
रावेंद्रकुमार रवि
चारुबेटा, खटीमा, ऊधमसिंहनगर (उत्तराखंड)

33 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर नवगीत है,
    परन्तु तमाम विसंगतियों
    और अवरोधों को पार कर
    बसन्त तो आ ही गया है!

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  2. पर्यावरण को हो रहे नुकसान को बहुत ही सुन्दर शब्दों मेड ढाला है बहुत बहुत बधाई धन्यवाद
    विमल कुमार हेडा

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  3. सपनों का इंद्रधनुष
    पाए कैसे दिगंत?
    मन-कुंठा फूल रही
    भाए कैसे बसंत?

    बहुत खूबसूरती से आपने ये बात रख दी है कि मन में यदि वैमनस्य हो ,कुंठा हो तो खुशियाँ कैसे मिलेंगी....बहुत सुन्दर रचना

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  4. विमल जी,
    संगीता जी,
    आप दोनों ने इस नवगीत
    के माध्यम से दिए गए संदेशों को
    सच्चे मन ग्रहण किया!
    --
    निसंदेह यह एक शुभ संकेत है!
    हृदय से आभारी हूँ!

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  5. बहुत सुंदर भाव लिये है आप की यह कविता. धन्यवाद

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  6. लीक से हटकर पर्यावरणीय प्रदूषण की समस्या को पुरजोर तरीके से शाब्दांकित करने हेतु साधुवाद.

    उत्तर देंहटाएं
  7. कचरे से पाट रहे
    ख़ुशियों को डाँट रहे!
    महक भरे झोंके अब
    कैसे आ पाएँगे?
    नेह-भरे सपने अब
    कैसे मुस्काएँगे?
    सपनों का इंद्रधनुष
    पाए कैसे दिगंत?
    मन-कुंठा फूल रही
    भाए कैसे बसंत?
    आए कैसे बसंत?
    chintaniya sthiti ka sunder chitran
    achchhi rachana badhai

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  8. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति के लिए बधाई

    रविजी,

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  9. रोज़-रोज़ काट रहे
    हर टहनी छाँट रहे!
    घोंसला बनाने को
    कैसे वे आएँगे?
    सुन उनका कल-कूजन
    क्या अब अँखुआएँग

    पर्यावरण पर चिंतन भाव उद्वेलित कर गया.....सुंदर रचना......रवि जी बधाई....


    पल पल रंग बदलती रितुएँ
    बिन बोले आ जायेंगी,
    तुम चाहो ना चाहो फिर भी
    रंग नये दिखलायेंगीं ॥

    गीता पंडित

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  10. शारदा जी!
    आपका कमेंट पढ़कर याद आया!
    कहीं पढ़ा था -
    पशुपालन के लिए
    न्यूज़ीलैंड के बड़े-बड़े जंगलों को
    काट-काटकर चरागाह बना दिए गए?
    जिसके दुष्परिणाम अब दृष्टिगोचर हो रहे हैं!
    क्या आप इस बात की
    सच्चाई के बारे में
    यहाँ कुछ बता सकती हैं?

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  11. "पल पल रंग बदलती ऋतुएँ
    बिन बोले आ जाएँगी,
    तुम चाहो ना चाहो फिर भी
    रंग नए दिखलाएँगीं!"
    --
    गीता जी,
    बहुत-बहुत आभारी हूँ!
    आपकी इन पंक्तियों ने मेरे इस नवगीत को
    गौरान्वित कर दिया!

    --
    ऐसे ही भाव
    उद्वेलित करना
    इस नवगीत का उद्देश्य है!

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  12. सच है बहुत अच्छी रचना है ,गीत पसंद ही नही बहुत पसंद आया क्योंकि इसमें बहुत अहम बाते कही गयी है
    रोज़-रोज़ काट रहे
    हर टहनी छाँट रहे!
    घोंसला बनाने को
    कैसे वे आएँगे?
    सुन उनका कल-कूजन
    क्या अब अँखुआएँग

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  13. "लीक से हटकर पर्यावरणीय प्रदूषण की समस्या को पुरजोर तरीके से शाब्दांकित करने हेतु साधुवाद."
    --
    यह बात तो केवल आचार्य संजीव सलिल जी ही कह सकते हैं!

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  14. बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

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  15. पर्यावरण / प्रकृति चिन्तन करती सुन्दर रचना । अगर ऐसा हीं चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हम वसंत देखने को तरस जायेगे । इतनी अच्छी नवगीत लखने के लिये बधाई ।

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  16. AApne aaj ki sachchai ko bahut hi alag dhang se apne shabdo se ukera hai.
    Hum ente byast ho gaye hai ki hum apni prakati ke bare me sochne ka time hi nahi nikal pate or jab kabhi kuchh chhan milte hai to es barbadi ke liye ek dusre par aarop madte rahte hai.

    thanks alot ..

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  17. सपनों का इंद्रधनुष
    पाए कैसे दिगंत?
    मन-कुंठा फूल रही
    भाए कैसे बसंत?
    आए कैसे बसंत?

    -इस नवगीत के माध्यम से आपने एक बहुत उम्दा संदेश भी दिया है. इस तरह के गीत ही सार्थक गीत कहलाते है. अनेक बधाईयाँ.

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  18. सपनों का इंद्रधनुष
    पाए कैसे दिगंत?
    मन-कुंठा फूल रही
    भाए कैसे बसंत?
    आए कैसे बसंत?
    बहुत सुन्दर गीत । बधाई

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  19. रावेन्द्र कुमार जी,
    सचमुच जब मन कुंठाओं से भरा होगा तो द्वारे पर खड़ा वसन्त भी मन के घर में प्रवेश करने में संकोच करेगा । वसन्त का उल्लास तो आँखों के झरोंखों से ही तो मन में जाएगा लेकिन द्वार तो खुला हो?
    प्रकॄति तथा मानसिक चिन्तन को शब्दों में पिरोता हुआ आपका नवगीत बहुत ही अच्छा लगा । धन्यवाद तथा बधाई ।
    शशि पाधा

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  20. रविजी,
    यह सत्य है कि अनावश्यक जन-वृद्धी हेतु, पशुपालन/ आवास/ कारखाने/ कृषि उत्पादन/ ईंधन तथा अनेक अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, न केवल न्यूज़ीलैंड बल्कि विश्व के लगभग सभी देशों में वन्य प्रदेशों को काट कर साफ़ किया गया था.
    परन्तु न्यूज़ीलैंड ने तो अपनी भूल सुधार कर स्थिति पर नियंत्रण पा लिया है. यहाँ सामूहिक रूप में वन रोपण के प्रोग्राम किये गाए और सम्प्रति भी इस तरह के कार्यक्रम अनिवार्य रूप से किये जा रहें हैं. फलस्वरूप घने जंगलों का प्रतिरोपण हो गया है.
    सप्रेम,
    शारदा

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  21. कभी मैंने भी लिखा था--
    चिडिया बैठी तार पर,मन में लिये मलाल ।
    कंकरीट के शहर में ,दिखे न कोई डाल ।-
    यह बात यों और भी खूबसूरत है---
    घोंसला बनाने को कैसे वे आएंगे....।गीत निस्सन्देह अच्छा है ।

    रवि, आपके गीतो को पढ रही हूँ ।यह गीतकार अबतक कहाँ छुपा था भाई ।

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  22. "aae kaise vasant" paryavaran bodh se labrej ek anuthi rachna hai,Raviji is janchetna ke lie badhaee

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  23. नवगीत के कथ्य ने शिल्प पर वरीयता पाकर इसे पठनीय के साथ-साथ माननीय भी बना दिया है. मनन के बाद कर्म करना हम भारतीयों का स्वभाव तो नहीं है पर आशा करें की न्यूजीलैंड की तरह यहाँ भी....

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  24. श्रीमान सलिलजी,
    समस्या का मूल कारण है जनसंख्या की अति है. सीमित जनसंख्या समस्त समस्याओं को निपटाने में सक्षम हुई है.

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  25. शारदा जी,
    आपके द्वारा दी गई जानकारी
    निसंदेह प्रेरणा की ज्योति जगाएगी
    और जागरूकता की एरोमा
    सकल विश्व में फैलाएगी!
    शुभकामना है कि
    आचार्य सलिल जी की इच्छा फले-फूले!

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  26. "भाई, तुम्हारे अन्दर यह गीतकार कहाँ छुपा था ?
    अनुभूति, संवेदना एवं सौन्दर्य-बोध तो
    पहले से था ही,
    पर अभिव्यक्ति की सुघड़ता निस्सन्देह
    आश्चर्यजनक व प्रसंशनीय है । सुखद भी ।"
    --
    गिरिजा दीदी!
    आपके मेल से मिले इस आशीष को
    सबके साथ बाँटने का मन किया!
    --
    आपकी टिप्पणी ने मुझे
    आपसे यह अनुरोध करने के लिए
    प्रेरित किया है कि "नवगीत की पाठशाला" की
    आगामी कार्यशालाओं में प्रतिभाग कर
    आप भी अभिनव नवगीतों का सृजन करें!

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  27. कचरे से पाट रहे
    ख़ुशियों को डाँट रहे!
    ये बात दिल को लगती है।

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  28. नवगीत के शिल्प का पूरी तरह निर्वाह करता हुआ यह बहुत सुन्दर नवगीत है । बसंत के स्वागत की सदैव से परम्परा रही है लेकिन समय के अनुसार अब उसके अर्थ बदल गये हैं और इसमे पर्यावरण की चिंता भी शामिल हो गई है । इतने छन्द पर्याप्त हैं फिरभी मुझे लगता है कि रवानी के लिये कथ्य को कुछ और विस्तार दिया जा सकता था ।

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  29. धन्यवाद, शरद जी!
    बहुत अच्छे कमेंट के लिए आभार!
    आपके सुझाव पर पूरा ध्यान दूँगा!

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  30. आपका नवगीत पढ़कर बेहद ख़ुशी हुई । पर्यावरण के प्रति आपके इस चिंतन में मैं आपके साथ हूँ । ईश्वर सबके मन में ऐसी ही भावनाएँ विकसित करे ।

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  31. Bahut Sundar va shreshtha srijan hai...pad kar man pulakit ho gaya aapane bilkul sahi kaha tha , bahut accha laga pad kar dhanyawaad!!

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  32. हमें यह चिंतन करना ही होगा कि जीवन में सिर्फ लालच और स्वार्थ को इतना महत्व न दें कि प्रदूषण से घायल प्रकृति को देखकर व्यथित हुए रचनाकार को ऐसा नवगीत रचना पड़े।
    आइए यह प्रण लें कि आज से प्रकृति के प्रति कुछ ऐसा करने का कि रचनाकार गीत रचे तो बसंत के स्वागत का और महकते प्रेम के माधुर्य का।

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