3 मई 2010

०५ : कैसे मन मुस्काए?: संगीता स्वरूप

कैसे मन मुस्काए?

रोटी समझ चाँद को
बच्चा मन ही मन ललचाए।
आशा भरकर वो यह देखे -
माँ कब रोटी लाए।
दशा देखकर उस बच्चे की
कैसे मन मुस्काए?

घर के बाहर
चलना दूभर,
साँस सभी की
नीचे-ऊपर,
काँप रहा उसका दिल थर-थर,
मन बेहद घबराए।
ऐसे आतंकी साये में
कैसे मन मुस्काए?

हुआ धमाका
बम का जब-जब,
बढ़ी वेदना
मन में तब-तब,
लहूलुहान हुए लोगों का
खून छितरता जाए।
इन दृश्यों को देख भला फिर
कैसे मन मुस्काए ?
--
संगीता स्वरुप

21 टिप्‍पणियां:

  1. इस रचना के व्यापक प्रचार की आवश्यकता है । वैसे मै संचालन मे आपका सन्दर्भ देकर उद्धृत करूँगा ।
    कविता पूरे देश की आवाज है ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. इस रचना के व्यापक प्रचार की आवश्यकता है । वैसे मै संचालन मे आपका सन्दर्भ देकर उद्धृत करूँगा ।
    कविता पूरे देश की आवाज है ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. इस रचना के व्यापक प्रचार की आवश्यकता है । वैसे मै संचालन मे आपका सन्दर्भ देकर उद्धृत करूँगा ।
    कविता पूरे देश की आवाज है ।

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  4. मनोज कुमार3 मई 2010 को 6:35 pm

    ह! शब्दों का कमाल! आतंक का चित्र खींच दिया।
    घर के बाहर
    चलना दूभर,
    साँस सभी की
    नीचे-ऊपर,
    काँप रहा उसका दिल थर-थर,
    मन बेहद घबराए।
    ऐसे आतंकी साये में
    कैसे मन मुस्काए?

    उत्तर देंहटाएं
  5. prashansneey rachna jiske shabd vyanjana bhi behtar hai. badhayi sangeeta swarup ji ko.

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  6. घर के बाहर
    चलना दूभर,
    साँस सभी की
    नीचे-ऊपर,
    काँप रहा उसका दिल थर-थर,
    मन बेहद घबराए। sab bayan kar diya aapne...bahut khoob

    उत्तर देंहटाएं
  7. mukhda aur dusara para dono hi dhyan khinchate hai badhai achchhi rachna ke liye

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  8. उत्तम द्विवेदी4 मई 2010 को 9:26 am

    घर के बाहर
    चलना दूभर,
    साँस सभी की
    नीचे-ऊपर,
    काँप रहा उसका दिल थर-थर,
    मन बेहद घबराए।
    ऐसे आतंकी साये में
    कैसे मन मुस्काए?

    क्या बात है... बधाई हो!

    उत्तर देंहटाएं
  9. विमल कुमार हेडा4 मई 2010 को 9:58 am

    अति सुन्दर रचना संगीता जी को बहुत बहुत बधाई
    धन्यवाद
    विमल कुमार हेडा

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  10. लहूलुहान हुए लोगों का
    खून छितरता जाए।
    इन दृश्यों को देख भला फिर
    कैसे मन मुस्काए ?
    ऐसे आतंकी साये में
    कैसे मन मुस्काए?

    True.बहुत सुंदर है

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  11. bahut sunder rachna Mumma.....yatharthwaadi lekhan k liye badhayi............

    :(:(

    uff ! kai saari cheezein aankhon ke aage ghoom gayin aapki kavita padhke...badi himmat se ye comment likha hai....:(

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  12. रोटी समझ चाँद को
    बच्चा मन ही मन ललचाए।
    आशा भरकर वो यह देखे -
    माँ कब रोटी लाए।
    दशा देखकर उस बच्चे की
    कैसे मन मुस्काए?

    बहुत ही मार्मिक और सारगर्भित नवगीत है!
    बहुत-बहुत बधाई!

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  13. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 08.05.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

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  14. संगीता जी
    शब्द-चित्र यह
    अनकहनी भी
    मौन रहा कह.
    पाठक शब्दों संग भावों में
    बिन प्रयास बह पाए.
    ऐसे मन छूते गीतों से
    कौन कभी बच पाए?

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  15. संगीता जी, ठीक ही कह रही हैं आप । आतंक और भूख से व्याकुल इस जगति में कोई भी मन कैसे मुस्का सकता है । धन्यवाद आपका एक अच्छी रचना के लिये ।
    शशि पाधा

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