8 मई 2010

१० : कैसी यह हवा चली?: शशि पाधा

डरी-डरी चौपाल है,
काँपती है हर गली।
कैसी यह हवा चली ?

झर गई हैं कोंपलें
रिश्तों की बेल की,
रीती-रीती गागरें
रँगों के मेल की।
मन के किसी छोर में,
आस्था गई छली।
कैसी यह हवा चली?

किस दिशा से आ रही
बारूद की दग्ध गंध,
कब किसी ने तोड़ दी
प्रेम की पावन सौगंध?
भस्म सद्भाव है,
संवेदना घुली-गली।
कैसी यह हवा चली?

टूटे पुलिन तो क्या हुआ,
नदी क्यों बहना छोड़ दे?
तरंग विश्वास की,
दो किनारे जोड़ दे।
मरुथलों में ढूँढ़ लो,
हरीतिमा की नव कली!
भीनी-सी हवा चली!
--
शशि पाधा

13 टिप्‍पणियां:

  1. भाव तो सुन्दर हैं,
    मगर लय में कमी लग रही है!
    मैंने गाने का बहुत प्रयास किया लेकिन गा नही पाया!

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  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 09.05.10 की चर्चा मंच (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
    http://charchamanch.blogspot.com/

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  3. टूटे पुलिन तो क्या हुआ,
    नदी क्यों बहना छोड़ दे?
    तरंग विश्वास की,
    दो किनारे जोड़ दे।
    मरुथलों में ढूँढ़ लो,
    हरीतिमा की नव कली!
    भीनी-सी हवा चली!

    सकारात्मक सन्देश देता अच्छा नवगीत....

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  4. भस्म सद्भाव है,
    संवेदना घुली-गली। bimb achchha hai
    aur
    मरुथलों में ढूँढ़ लो,
    हरीतिमा की नव कली!
    भीनी-सी हवा चली!।aasha ka drishtikon poornta pradan karta hai

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  5. विमल कुमार हेड़ा10 मई 2010 को 8:49 am

    टूटे पुलिन तो क्या हुआए
    नदी क्यों बहना छोड़ देघ्
    तरंग विश्वास कीए
    दो किनारे जोड़ दे।
    मरुथलों में ढूँढ़ लोए
    हरीतिमा की नव कली!
    भीनी.सी हवा चली!

    सुंदर गीत शशि पाधा जी को बहुत बहुत बधाई।
    धन्यवाद
    विमल कुमार हेड़ा

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  6. शशि जी !
    अत्यंत हृदयस्पर्शी एवं भाव पूर्ण गीत
    चुम्बकीय प्रतीक | संदेश निहित किए एक सुंदर सकारात्मक रचना |
    सदैव की भाँति पढ़कर बहुत अच्छा लगा |

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  7. शशि जी!
    एक सार्थक प्रयास... आपको अर्पित कुछ पंक्तियाँ:
    लुट गयी है झोपडी
    महलों को झेलती.
    बेबस ऊषा-संध्या
    चुप वसुधा ठेलती.
    सदा ठीक महांबली
    रवि-शशि का गलत- सही
    कैसी यह हवा चली?
    Acharya Sanjiv Salil

    http://divyanarmada.blogspot.com

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  8. डरी-डरी चौपाल है,
    काँपती है हर गली।
    कैसी यह हवा चली?...

    टूटे पुलिन तो क्या हुआ,
    नदी क्यों बहना छोड़ दे?
    तरंग विश्वास की,
    दो किनारे जोड़ दे।
    मरुथलों में ढूँढ़ लो,
    हरीतिमा की नव कली!
    भीनी-सी हवा चली!
    ...एक सुंदर सकारात्मक रचना! अतिसुन्दर!

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  9. इसी रचना की एक और कड़ी जो नियमानुसार मैं रचना के साथ नहीं भेज सकी थी सोचा आज आप सब के साथ बाँट लूँ --
    टूटी लाल चूड़ियाँ
    आज किसी शहर में
    गोद सूनी हो गई
    हिंसा के गहन कहर में

    और इक मासूम के
    हाथ से चिता जली
    कहाँ से यह हवा चली ?

    आप सब गुणीजनों का हार्दिक धन्यवाद
    सादर ,
    शशि पाधा

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