16 मई 2010

१८ : हादसे ही हादसे : अजय गुप्त

बाजुओं में
उफ़, अचाहे ही कसे,
हादसे, बस, हादसे ही हादसे।

चाह थी सब
लोग आपस में रहें,
प्रेम, श्रद्धा, स्नेह, सुख से, मेल से।
क्या पता था,
स्वार्थ निर्मित ट्रैक पर,
कटेंगे हम, नफ़रतों की रेल से।

और भोले
यात्रियों की नियति पर,
व्यंग्य बेपरवाह सिग्नल ने कसे।

मकबरों में
बदल जाना घरों का,
यातनाओं का बहुत लंबा सफ़र।
देखकर भी
लोग क्यों पढ़ते नहीं,
इस तरह पल-पल बिखरने की ख़बर।

फितरतें हर
पल जहाँ पर दाँव दें,
चाहकर भी आदमी कैसे हँसे?
--
अजय गुप्त

4 टिप्‍पणियां:

  1. स्वार्थ निर्मित ट्रैक पर,
    कटेंगे हम, नफ़रतों की रेल से। bahut achchi pankiya...poori kavita lajawaab...

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  2. मार्मिक....अच्छा नवगीत

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  3. हम सयाने
    जाल में अपने फंसे.
    मिले राहू-केतु रवि-शशि को ग्रसे.

    गुप्त है क्या?
    भेद सारे हैं खुले.
    हैं अजेय किन्तु वंचित श्रेय से.
    गीत ऐसे ही
    रचें नवगीतकार.
    लगें जो सबको हमेशा गेय से.

    अजय होकर
    सियासत की भीति पर
    स्वार्थ तज परमार्थ को फिर ना हँसे..

    नवगीत रुचा.

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