17 मई 2010

१९ : किससे कहें हम : अशोक अंजुम

बच्चों के सीनों से
चिपके हैं बम
,
अट्टहास करते हैं

देख परचम


गलियों में रस्तों पर
खून की फुहार,
लटके तस्वीरों पर
मुरझाए हार
देख-देखकर होतीं
आँखें नित नम


अपनों के बीच उगी
सुदृढ़ दीवार,
हिस्सों बँटता गया
अन्तस् का प्यार
हृदय की पीड़ा को
किससे कहें हम
--
अशोक अंजुम

6 टिप्‍पणियां:

  1. sahi kaha par ye sab apni kalam se kehte rahiye ham sun rahe hain sun hi nahi rahe kuch karne ka prayas bhi karenge...

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  2. हृदय की पीड़ा को
    किससे कहें हम
    वाकई बहुत त्रासद स्थिति है
    कहें किससे?
    सुन्दर रचना

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  3. विमल कुमार हेडा़18 मई 2010 को 8:33 am

    अपनों के बीच उगी
    सुदृढ़ दीवारए
    हिस्सों बँटता गया
    अन्तस् का प्यार।
    हृदय की पीड़ा को
    किससे कहें हम
    सुन्दर पंक्तियाँ अशोक अंजुम जी को बहुत बहुत बधाई
    धन्यवाद
    विमल कुमार हेडा़

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  4. आये हैं महफिल में
    अशोक अंजुम,
    थामे करुणा रस का
    कर में परचम.

    गागर में सागर है
    इनकी खासियत.
    कम में कहते अधिक
    है खूब हैसियत.
    जितने भी पढो गीत
    लगते हैं कम.

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  5. वाह अंजुमजी, क्या खूब नवगीत लिखा है, वैसे रचनाकार की असली पहचान तो यही है कि वह विषय विशेष पर किस तरह से कलम चलाता है और कहां तक सफल हो पाता है। आपकी कलम मुद्दों को भुनाना जानती है। बहुत-बहुत बधाई।
    -महेश सोनी, भोपाल

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