27 मई 2010

२९ : स्वस्ति आतंकों घिरी : राजेंद्र वर्मा

काग़ज़ों में खो गई संवेदना।
आप ही कहिए -
करें तो क्या करें?

शब्द-मंथन भी हुआ है,
अर्थ-चिंतन भी हुआ है,
किंतु निर्वासित हुई है सर्जना।
आप ही कहिए -
करें तो क्या करें?

स्वस्ति आतंकों-घिरी है,
लेखनी की मति फिरी है,
विश्वव्यापी अर्थ की अभ्यर्थना।
आप ही कहिए -
करें तो क्या करें?

बादलों की छाँव-ख़ातिर,
राह से भटका मुसाफ़िर,
कुछ कहो तो है 'उभयनिष्ठी' तना।
आप ही कहिए -
करें तो क्या करें?
--
राजेंद्र वर्मा

4 टिप्‍पणियां:

  1. इस नवगीत की ये पंक्तियाँ -' काग़ज़ों में खो गई संवेदना।
    आप ही कहिए -
    करें तो क्या करें?'
    ध्यान आकर्षित करती हैं।

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  2. विमल कुमार हेडा़28 मई 2010 को 8:35 am

    काग़ज़ों में खो गई संवेदना।
    आप ही कहिए -
    करें तो क्या करें?

    गहन चिन्तन का विषय है
    बहुत बहुत बधाई धन्यवाद।

    विमल कुमार हेडा़

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  3. किन्तु निर्वासित हुई है सृजना ,उम्दा गीत है,

    उत्तर देंहटाएं

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