16 अगस्त 2010

२० : ताल भरे कमल खिले : कुमार रवींद्र

दिन बरखा-बिजुरी के
ताल भरे
कमल खिले

रात सुना मेघराग
दिन भर घर बदराया
छत पर हर सांझ दिखा
इन्द्रधनुष का साया

बिरवे सब हरे हुए
पीपल के
पात हिले

कमल-पात बूँद-बूँद
सुख सहज सहेज रहे
कजरी ने बदरा से
उस सुख के हाल कहे

बार-बार मेघराज
बरगद से
गले मिले

भीज-भीज
फूलों की पगडंडी हुई साँस
धुली-धुली हवा भरे
मन में मीठे हुलास

ताप मिटे सारे ही
नहीं रहे
कोई गिले
--
कुमार रवींद्र

7 टिप्‍पणियां:

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  2. उत्तम द्विवेदी17 अगस्त 2010 को 7:10 pm

    सुन्दर रचना के लिए बधाई!

    कमल-पात बूँद-बूँद
    सुख सहज सहेज रहे
    कजरी ने बदरा से
    उस सुख के हाल कहे
    कमल और कजरी दोनों को सम्बंधित कर कमल के सांस्कृतिक महत्व को नये तरीके से व्यक्त किया गया है.धन्यवाद!

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  3. शानदार रचना. साधुवाद.

    हो विदेह, हँसे देह
    पराया निज लगे गेह.
    सिहरन है, फुहरन है
    भावों के सरस मेह.

    नयन मिले, झुके, उठे,
    दिल से दिल
    विहँस मिले.

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  4. रात सुना मेघराग
    दिन भर घर बदराया
    छत पर हर सांझ दिखा
    इन्द्रधनुष का साया

    बिरवे सब हरे हुए
    पीपल के
    पात हिले

    ज्यों ज्यों नवगीत की यह कार्यषाला अपने मुकाम पर पहंुच रही त्यों त्यों वह और भी जवान हो रही है मानो जेठ के विरवे को बरसात का जोड़न मिल रहीं है और वह लहलहाता जा रह है कम से कम आपकी उपर्युक्त पंक्तियों से तो यही लगता है । बधाई हो रवीन्द्रजी आपको इस सुमधुर गीत के लिए।

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  5. magho ki ritu aai
    aai magho ki ritu
    machal machal kar
    umad ghumad kar
    aye tum badli ban kar
    par rahi dhara pyasi hi
    kyu n barse tum pavas ban kar
    hole hole madhyam madhyam
    har aur tumhara hunkara
    par rahi dhara pyasi hi
    kyu n tumne kheto ko lahraya
    magho ki ritu aai
    aai magho ki ritu
    par rahi dhara pyasi hi
    kyu tumne itna bharmaya
    Posted by saru at 5:

    उत्तर देंहटाएं

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