2 सितंबर 2010

०१. घन-घन मेघ बजे : राणा प्रताप सिंह

सूरज से करके बरजोरी
घन-घन मेघ बजे

छोड़ किनारे द्वारे-द्वारे
नदिया आज फिरे
दिन अलसाए मन पनियाए
हैं बिखरे-बिखरे
हरियाली का घुँघटा काढ़े
वसुधा खूब लजे

ऊसर मन में प्रेम के अंकुर
अभी-अभी फूटे
आसमान में उड़े है पंछी
पिंजरे है टूटे
कूची में उस चित्रकार के
कितने रंग सजे

टूटी मेड़ भरा है पानी
कोई बंद लगे
घुटनों भर की धोती में
जैसे पैबंद लगे
देख कृषक काया बरबस ही
श्रद्धा भाव उपजे
--
राणा प्रताप सिंह
(नैनी, इलाहाबाद)

13 टिप्‍पणियां:

  1. कार्यशाला : 10 की
    बहुत बढ़िया शुरूआत की गई है!
    --
    इस नवगीत को पढ़कर मन मुदित हो गया!
    --
    मेरी तरफ से भी सबको
    श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर बधाई और शुभकामनाएँ!

    --
    मेरा कान्हा, मेरा मीत ... ... .
    आज सुना दे मुझको कान्हा ... ... .

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  2. बहुत अच्छा नवगीत। आंखों के सामने पूरा चित्र खींचकर रख दिया। भाशा कथ्यानुकूल। एक खास बात और राना का एक प्रयोग बता रहा है कि वे ग़ज़लकार भी हैं-श्रद्धा भाव उपजे का प्रयोग में भाव उपजे का उच्चारण भावुपजे है। बहुत-बहुत बधाई
    आदरणीय पूर्णिमाजी को इतनी खुष्बूनुमा “ाुरूआत के लिए प्रणाम के साथ।

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  3. बहुत अच्छा नवगीत। आंखों के सामने पूरा चित्र खींचकर रख दिया। भाशा कथ्यानुकूल। एक खास बात और राना का एक प्रयोग बता रहा है कि वे ग़ज़लकार भी हैं-श्रद्धा भाव उपजे का प्रयोग में भाव उपजे का उच्चारण भावुपजे है। बहुत-बहुत बधाई
    आदरणीय पूर्णिमाजी को इतनी खुष्बूनुमा “ाुरूआत के लिए प्रणाम के साथ।

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  4. राणाप्रताप सिंह जी जब आपने घनघन मेघ बजा ही दिया है तो मेरा मन है यह बजता जाए और तबतक बजता जाए जबतक मन वीणा का
    एक एक तार न झंकृत हो जाए। सभी सहभागियों को हार्दिक आभार

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  5. डा सुभाष राय3 सितंबर 2010 को 9:49 am

    सूरज से मेघ की बरजोरी अच्छा चित्र है. कृषक की अभावाकुल जिन्दगी का भी अच्छा वर्णन है, पर कहीं-कहीं लयभंग की स्थितियां हैं. अंतिम पंक्तियों में बहुत साफ दिखता है. इससे बचना चाहिये.

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  6. राणा प्रताप सिंह जी, बहुत ही सुंदर गीत कहा है अपने ! मानो गीत की हर पंक्ति गा रही हो, गीत पढ़ते हुए जैसे पूरा परिदृश्य आँखों के सामने घटित होता प्रतीत हो रहा है ! दिल से बधाई देता हूँ आपको और नवगीत को !

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  7. अनुकूल प्रभावों से साक्षात्कार कराती हुई बहुत अच्छी कृति है.
    वर्षा ऋतु के मनोरम रंगों व उसके अनेक चित्रों द्वारा प्रकृति को सजाया गया है.

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  8. मनमोहक गीत प्रस्तुत करने के लिए बधाई आर पी| हिन्दी शब्दों पर भी अच्छा अधिकार है तुम्हारा| "दिन अलसाए - मन पनियाए" वाला प्रयोग बहुत ही उम्दा लगा मुझको| और भैया, हमें कृपया संदेशा दे दिया करो या टेग कर दिया करो|

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  9. उत्तम द्विवेदी3 सितंबर 2010 को 3:44 pm

    बहुत ही सुन्दर नवगीत, सिंह जी को बहुत-बहुत बधाई!

    टूटी मेड़ भरा है पानी
    कोई बंद लगे
    घुटनों भर की धोती में
    जैसे पैबंद लगे
    देख कृषक काया बरबस ही
    श्रद्धा भाव उपजे
    ---अतिसुन्दर पंक्तियाँ

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  10. नवगीत के तत्वों का सरस समावेश करती यह रचना रुची. संजीव गौतम जी ने सही इंगित किया है. ''देख कृषक काया बरबस ही
    श्रद्धा भाव उपजे'' को 'देख कृषक काया बरबस ही नेह भाव उपजे' करने से उच्चारण दोष समाप्त हो जाता है. बरजोरी, अलसाए, पनियाए, ऊसर, मेड़, पैबंद आदि शब्द-प्रयोग शब्द चित्र को जीवंत कर रहे हैं.

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  11. विमल कुमार हेड़ा।7 सितंबर 2010 को 12:12 pm

    टूटी मेड़ भरा है पानी
    कोई बंद लगे
    घुटनों भर की धोती में
    जैसे पैबंद लगे
    देख कृषक काया बरबस ही
    श्रद्धा भाव उपजे
    पंक्तियां अच्छी लगी। सुन्दर रचना के लिये राणा जी को बहुत बहुत बधाई
    धन्यवाद।
    विमल कुमार हेड़ा।

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