20 सितंबर 2010

०८. घर का कोना-कोना सिसके

कीटनाशकों से जो पलकर
आई ताज़ी सब्जी
अनजाने ही उसको अम्मा
रही प्रेम से राँध

कूड़ा-कचरा भरे 'प्लॉट' में
बूँदें करतीं नर्तन
बीमारी के अणुओंवाली
पायल पग में बाँध
नर्तन के इस मधुर गान से
उठने लगी सड़ाँध

नाली के गंदे पानी में
अब बूँदों का क्रंदन
घर में घुसकर आ जाता है
घर की देहरी फाँद
घर का कोना-कोना सिसके
बनकर दुख की नाँद
--रावेंद्रकुमार रवि

3 टिप्‍पणियां:

  1. विसंगतियों और विडम्बनाओं को केंद्र में रखकर नवगीत के प्रतिमानों पर खरी उतरती रचना मन को झकझोर रही है.

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  2. उत्तम द्विवेदी22 सितंबर 2010 को 11:49 am

    वर्षा जीतनी आनंददायी होती है विसंगतियों से मिलकर उससे कहीं अधिक दुखदायी हो जाती है. वर्षा के इस दूसरे रूप को आप ने नवगीत के माध्यम से बहुत ही सुन्दर तरीके से व्यक्त किया है. बहुत-बहुत बधाई!

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  3. नाली के गंदे पानी में
    अब बूँदों का क्रंदन
    घर में घुसकर आ जाता है
    घर की देहरी फाँद
    घर का कोना-कोना सिसके
    बनकर दुख की नाँद
    “उस अनाम रचनाकार को “ात “ात सलाम इस संुदर व सटीक अनुभूति के लिए

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